समकालीन मनोविज्ञान की शोध प्रणालियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां सामान्य मनोविज्ञान की संकल्पना पर एक संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया  गया था। इस बार समकालीन मनोविज्ञान द्वारा प्रयोग में ली जाने वाली शोध प्रणालियों पर हम थोड़ा-सा विस्तार से चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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समकालीन मनोविज्ञान की शोध प्रणालियां
मनोवैज्ञानिक जांच-पड़ताल की प्रणालियां मनोविज्ञान द्वारा साकार बनाये गये मूल सैद्धांतिक तत्वों और उसके ठोस कार्यभारों पर निर्भर होती है। यहां पर विवेचित किया जाने वाला सामान्य मनोविज्ञान, मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के प्रति बुनियादी उपागम द्वंदात्मक प्रणाली की आवश्यकताओं से निर्धारित होता है। द्वंदात्मक प्रणाली में यह आवश्यक है कि किसी भी वस्तु की परीक्षा अन्य वस्तुओं के साथ उसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संबंधों को ध्यान में रखते हुए की जाए और जो सबसे मुख्य चीज़ है, परिघटनाओं तथा नियमों के बीच तात्विक संबंधों का पता लगाया जाए, अध्ययनगत परिघटना का उसके विकास में विश्लेषण किया जाए और अंतर्विरोधों को, उनकी एकता तथा द्वंद को, परिमाणात्मक परिवर्तनों के गुणात्मक परिवर्तनों में रूपांतरण को उदघाटित किया जाए। मनोविज्ञान में प्रयुक्त प्रणालियों को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से जांचा जाना चाहिए।

प्रत्ययवादी ( idealistic ) मनोविज्ञान मनुष्य की “आत्मा” में पैठने के लिए जो एकमात्र प्रणाली सुझा सका, वह आत्मावलोकन ( अथवा अंतर्निरीक्षण, अंतर्दृष्टि ) की प्रणाली थी। चूंकि वह “आत्मा” ( मन, चेतना ) की एक बंद अंतर्जगत, एक विशिष्ट आध्यात्मिक तत्व के रूप में, जो मानो बाह्य विश्व से नहीं जुड़ा हुआ है, कल्पना करता है, अतः आत्मावलोकन की प्रणाली उसके लिए एक स्वाभाविक परिणति थी। प्रत्ययवादी दार्शनिक कहते थे कि मानसिक परिघटनाओं का संज्ञान केवल आत्मावलोकन के जरिए ही किया जा सकता है। किंतु यह विश्वास उतना ही भ्रामक है, जितना अभौतिक आत्मा में विश्वास, जिस पर मानो प्रकृति के नियम लागू नहीं होते। केवल आत्मावलोकन द्वारा प्राप्त जानकारी वैज्ञानिक दृष्टि से प्रामाणिक नहीं है, चाहे यह विशेषतः प्रशिक्षित मनोविज्ञानियों द्वारा ही क्यों ना किया गया हो। शिक्षित वयस्क द्वारा आत्मावलोकन के द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर शिशु अथवा पशु के मानस की व्याख्या तो और भी अमान्य है। किंतु ऐसे प्रयत्न अत्यंत समर्पित अंतर्दर्शी मनोविज्ञानियों द्वारा किये गये थे, जिन्होंने पूरी गंभीरता के साथ अपने को पशुओं के स्थान पर रखा और फिर अपनी मानव-चेतना के गुणों के अनुसार ही पशुओं की चेतना की प्रतिकृति की।

अंतर्निरीक्षण की प्रणाली के विलोमतः, मन की द्वंदात्मक वस्तुपरक प्रणाली, मन का वस्तुपरक अध्ययन करती है, अनुसंधान में आत्मपरकता के लिए कोई गुंजाईश नहीं छोड़ती और अन्य प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों जैसी ही वस्तुपरक पद्धतियां अपनाये जाने का मार्ग प्रशस्त करती है। यह प्रणाली, वैज्ञानिक मनोविज्ञान में स्वीकृत चेतना तथा सक्रियता की एकता के नियम पर आधारित है

मन के वस्तुपरक अध्ययन में मानसिक परिघटनाओं की उत्पत्ति तथा अभिव्यक्ति की वस्तुपरक परिस्थितियों की जांच शामिल है। अनुसंधान का वस्तुपरक सिद्धांत, अंतर्मुखी ध्यान द्वारा मानसिक परिघटनाओं के सीधे अवबोधन की प्रणाली नही, अपितु व्यवहित संज्ञान का रास्ता ( अर्थात सक्रियता में मानसिक परिघटनाओं की वस्तुपरक अभिव्यक्तियों के विश्लेषण के जरिए अनुसंधान ) है। सही रूप से अनुमानित परिस्थितियों में संपन्न मानव-सक्रियता का अध्ययन करके हम मानसिक प्रक्रियाओं के बारे में ठोस निष्कर्षों पर पहुंच सकते हैं। उल्लेखनीय है कि अध्येता द्वारा अपनी मानसिक प्रक्रियाओं का वस्तुपरक अध्ययन भी असल में उन्हीं व्यवहित प्रणालियों से किया जाता है, जिनसे वह दूसरे व्यक्तियों की मानसिक प्रक्रियाओं को जांचता और आंकता है।

बहुसंख्यक अध्ययन दिखाते हैं कि किसी भी मनुष्य के व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन स्वयं उस मनुष्य द्वारा नहीं, अपितु उसके आसपास के लोगों द्वारा, उसे अरसे से जानने वाले लोगों द्वारा किया जाता है। किशोरों के मनोवैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि कोई भी किशोर पहले अपने संबंधियों और मित्रों की व्यक्तिगत मानसिक विशेषताओं को वस्तुपरक ढ़ंग से आंकना सीखता है और इसके बाद ही अपने अनुभवजन्य मनोवैज्ञानिक ज्ञान को जैसे कि अपने ऊपर प्रक्षिप्त करता है और अपनी विशेषताओं व गुणों के एक न्यूनाधिक सही मूल्यांकन पर पहुंचता है।
तथ्य दिखाते हैं कि मनोविज्ञान अपने ज्ञान का विस्तार आत्मावलोकन के जरिए नहीं, वरन वस्तुपरक प्रणालियों के क्रियान्वयन के जरिए करता है। किंतु एक प्रणाली के रूप में आत्मावलोकन के निषेध को , आत्मावलोकन का पूर्ण निषेध नहीं समझना चाहिए। हम अपने कार्यों को एक विशिष्ट किस्म के आत्मावलोकन के जरिए आंक सकते हैं, यानि उनका लगभग उसी ढ़ंग से विवेचन और विश्लेषण कर सकते हैं, जिस ढ़ंग से इन कार्यों का अध्ययन करने वाले अन्य लोग करते हैं। फिर भी इस प्रकार के आत्मावलोकन को अंतर्निरीक्षण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह अनुसंधान का प्रत्यक्ष नहीं, अपितु एक व्यवहित या अप्रत्यक्ष तरीका है। परिणामों की व्याख्या में संभावित आत्मपरकता के कारण यह आम प्रेक्षण से थोड़ा सा ही अधिक प्रामाणिक होता है। अनुचिंतन ( अपनी मानसिक अवस्थाओं तथा गुणों के बारे में सोचना तथा उनसे गुजरना ) को भी अंतर्निरीक्षण का समानार्थी नहीं समझना चाहिए, क्योंकि अनुचिंतन भी व्यवहित होता है और उसमें वाचिक विवरन का संसाधन, अपने कार्यों का विश्लेषण, संबंधित निष्कर्ष निकालना, अपने बारे में अपने मत की दूसरों के मत से तुलना, आदि शामिल रहते हैं।

सभी प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों की भांति ही मनोविज्ञान में भी आगे विश्लेषण का विषय बननेवाली सामग्री के संग्रह की दो प्रणालियां हैं : प्रेक्षण और प्रयोग। ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में वैज्ञानिक संज्ञान के इन उपकरणों का इस्तेमाल संदेहातीत है। प्रत्ययवादी मनोविज्ञान प्रेक्षण और आत्मावलोकन ( अंतर्निरीक्षण ) में भेद नहीं करता था और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में, विशेषतः उच्चतर मानसिक प्रक्रियाओं के अनुसंधान में प्रयोग को तनिक भी महत्वपूर्ण नहीं मानता था।

प्रेक्षण मानसिक अनुसंधान की प्रणाली तभी बन सकता है, जब वह बाह्य परिघटनाओं के वर्णन तक ही सीमित न रहे, बल्कि उनके मनोवैज्ञानिक स्वरूप की व्याख्या भी करे। वैज्ञानिक प्रेक्षण का उद्देश्य मनोवैज्ञानिक तथ्यों को दर्ज़ करना ही नहीं, उनके कारणों को प्रकाश में लाना, यानि उनकी वैज्ञानिक व्याख्या करना भी है। इसके विपरीत तथाकथित रोज़मर्रा के प्रेक्षण, जो मनुष्यों के सांसारिक अनुभवों की बुनियाद होते हैं और अन्य लोगों के कार्यों तथा व्यवहार के कारणों को जानने के उसके प्रयत्नों के परिचायक हैं, व्यष्टिक तथ्यों को दर्ज़ करने से संबंध रखते हैं।

रोज़मर्रा के प्रेक्षण अपने यादृच्छिक स्वरूप, स्वतःस्फूर्तता और विश्रृंखलता के कारण वैज्ञानिक प्रेक्षणों से भिन्न होते हैं। वे मानसिक प्रक्रियाओं की उत्पत्ति तथा विकास से संबंधित सभी बुनियादी परिस्थितियों को विरले ही ध्यान में रख पाते हैं। फिर भी रोज़मर्रा के प्रेक्षण चूंकि अनगिनत और सरासर व्यवहारिक होते हैं, इसलिए कभी-कभी वे गहन मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि की मिसालें भी पेश करते हैं और मनोविज्ञानियों के लिए बड़ी मूल्यवान कहावतों और उक्तियों का रूप धारण कर लेते हैं। रोज़मर्रा के प्रेक्षण से भिन्न वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक प्रेक्षण का सारतत्व, व्यवहार अथवा सक्रियता से संबंधित प्रेक्षणाधीन तथ्यों के वर्णन से उनके मनोवैज्ञानिक मर्म की व्याख्या में संक्रमण है। यह संक्रमण प्राक्कल्पना का रूप ले लेता है, जो प्रेक्षण के दौरान पैदा होती है। ऐसी प्राक्कल्पना का सत्यापन अथवा खंडन बाद के प्रेक्षणों का विषय होता है। यह आवश्यक है कि मनोवैज्ञानिक प्रेक्षण एक स्पष्ट योजना पर आधारित हो।

वस्तुपरक वैज्ञानिक अनुसंधान और नये मनोवैज्ञानिक तथ्यों के संग्रहण की मुख्य विधि प्रयोग है। प्रेक्षण के विपरीत प्रयोग मनुष्य की सक्रियता में अध्येता के सक्रिय हस्तक्षेप की संभावना  प्रदान करता है। अध्येता ऐसी परिस्थितियां पैदा करता है, जिनमें मनोवैज्ञानिक तथ्य को स्पष्टतः उद्‍घाटित किया जा सके, आवश्यक दिशा में बदला जा सके अथवा सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप से जांच के लिए बारंबार पुनर्प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रयोगात्मक प्रणाली को प्रयोगशालीय अथवा प्राकृतिक प्रयोग के रूप में लागू किया जा सकता है।

प्रयोगशाला-प्रयोग की विशेषता यह नहीं है कि वह विशेष मनोवैज्ञानिक उपकरणों की मदद से प्रयोगशाला की परिस्थितियों में किया जाता है और जिस व्यक्ति पर प्रयोग किया जा रहा है, वह विशेष निर्देशों के अनुसार क्रियाएं करता है। प्रयोगशालीय प्रयोग की विशेषता यह भी है कि प्रयोगाधीन व्यक्ति को अपने प्रयोगाधीन होने की बात पूरी तरह से मालूम होती है ( हालांकि सामान्यतयाः उसे प्रयोग के उद्देश्य और अनुसंधान के लक्ष्य की जानकारी नहीं होती )। ये प्रयोग ध्यान, प्रत्यक्ष, स्मृति, आदि के गुणों को सामने लाने में सहायक होते हैं।

प्राकृतिक प्रयोग की प्रणाली का उद्देश्य प्रयोगाधीन व्यक्ति को अपने प्रयोगाधीन होने के ज्ञान से उत्पन्न तनाव से मुक्त रखना और अनुसंधान के लिए सामान्य, जानी-पहचानी परिस्थितियां ( पाठ, बातचीत, खेल, होमवर्क आदि ) मुहैया कराना है।

प्राकृतिक प्रयोग की एक मिसाल स्मृति प्रक्रिया के बारे में, स्मृति की प्रतिधारण-तंत्र पर निर्भरता के बारे में अनुसंधान है। एक ही तरह की सामग्री स्कूली बच्चों के दो समूहों को उसे याद करने के लिए कहा गया और बताया गया कि पहले समूह से वही सामग्री अगले दिन पूछी जाएगी तथा दूसरे समूह से एक सप्ताह बाद। वास्तव में पूछा गया दो सप्ताह बाद। और तब पता चला कि लंबी अवधिवाला स्मृति-तंत्र अधिक परिणामदायी होता है।

वे मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षावैज्ञानिक प्रयोग विशेष महत्व रखते हैं, जो प्राकृतिक परिस्थितियों में किए जाते हैं। वर्तमान काल में प्रयोगशालीय और प्राकृतिक प्रयोगों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन-रेखा नहीं है और उनके अंतरों को निरपेक्ष नहीं माना जाना चाहिए।

मनोवैज्ञानिक तकनीकें अनुसंधान में ही नहीं, परीक्षण के उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। इस मामले में लक्ष्य वैज्ञानिक ज्ञान को गहनतर बनाने के लिए आवश्यक नयी जानकारी प्राप्त करना नहीं, वरन यह मालूम करना होता है कि किसी व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक विशेषताएं, प्रचलित मनोवैज्ञानिक मानकों और मापदंडों से कहां तक मेल खाती हैं। अनुसंधानकर्ता जिन प्रणालियों से व्यक्ति की निश्चित मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को मालूम करने का यत्न करता है, वे प्रणालियां परीक्षण कहलाती हैं।

मनोवैज्ञानिक समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान के लिए उपयुक्त अनुसंधान तकनीकों का उपयोग आवश्यक है। मनोवैज्ञानिक अध्ययन की वस्तुपरक प्रणालियों के व्यापक उपयोग के बिना आज मनोविज्ञान के क्षेत्र में उच्चस्तरीय अनुसंधान नहीं किये जा सकते।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

सामान्य मनोविज्ञान की संकल्पना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां व्यवहारवाद और मनोविश्लेषण पर एक संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया  गया था। इस बार सामान्य मनोविज्ञान की संकल्पना पर शुरूआती चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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सामान्य मनोविज्ञान की संकल्पना

समकालीन मनोविज्ञान में विभिन्न कसौटियों के आधार पर अनेक शाखाएं हैं जो विकास की विभिन्न अवस्थाओं और व्यवहारिक प्रयोग में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी हुई विद्या-विशेषों की विस्तृत पद्धतियां हैं। ठोस सक्रियता, विकास तथा मनुष्य के समाज से संबंधों के आधार पर मनोविज्ञान की शैक्षिक, विधिक, चिकित्सीय, तुलनात्मक और अन्य शाखाओं के विपरीत सामान्य मनोविज्ञान, जैसा कि इसके नाम से ही ध्वनित होता है, मनोवैज्ञानिक परिघटनाओं का नियमन करने वाले सामान्य नियमों तथा सैद्धांतिक मूलतत्वों से और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में प्रयुक्त आधारभूत वैज्ञानिक अवधारणाओं तथा शोध प्रणालियों से संबंध रखता है

सामान्य मनोविज्ञान को कभी-कभी सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक मनोविज्ञान भी कहा जाता है। इसका कार्य मनोविज्ञान के प्रणालीतंत्र तथा इतिहास का और मानसिक परिघटनाओं की उत्पत्ति, विकास और अस्तित्व के लिए लाक्षणिक सर्वाधिक सामान्य नियमसंगतियों के अनुसंधान के सिद्धांत तथा प्रणालियों का अध्ययन करना है। सामान्य मनोविज्ञान संज्ञानात्मक और सृजनात्मक सक्रियता, संवेदनों, प्रत्यक्षों, स्मृति, कल्पना, चिंतन तथा मानसिक आत्म-नियमन के सामान्य नियमों, व्यक्तित्व की विभेदक मनोवैज्ञानिक विशेषताओं, चरित्र तथा स्वभाव, व्यवहार के मुख्य अभिप्रेरकों, आदि का अध्ययन करता है। सामान्य मनोविज्ञान द्वारा किये गये अध्ययनों के परिणाम मनोविज्ञान की सभी शाखाओं और उप-शाखाओं के विकास का आधार बनते हैं

इसीलिए, फिलहाल हम सामान्य मनोविज्ञान तक ही सीमित रहेंगे और यहां मनोविज्ञान अनुसंधान के सामान्य सैद्धांतिक तत्वों और मुख्य प्रणालियों तथा मूलभूत संकल्पनाओं का विवेचन और मनोविज्ञान जिन नियमसंगतियों की खोज करता है, उन पर ही अपनी चर्चा केन्द्रित करेंगे। शैक्षणिक उद्देश्य से मनोविज्ञान की मूलभूत संकल्पनाओं को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है : मानसिक प्रक्रियाएं, मानसिक अवस्थाएं, और मानसिक गुण अथवा व्यक्तित्व की विशेषताएं

मानसिक प्रक्रियाओं में सामान्यतः संज्ञानात्मक परिघटनाओं को शामिल किया जाता है। ये हैं : संवेदन और प्रत्यक्ष, जो ज्ञानेन्द्रियों पर सीधे प्रभाव डालनेवाली वस्तुओं ( क्षोभकों ) के प्रतिबिंब हैं ;  स्मृति, जो यथार्थ का पुनरुत्पादित प्रतिबिंब है ;  कल्पना और चिंतन, जो प्रत्यक्ष संज्ञान की पहुंच से बाहर स्थित यथार्थ के गुणधर्मों का मनुष्य की चेतना में सामान्यीकृत तथा अपरिवर्तित प्रतिबिंब हैं ;  इच्छामूलक प्रक्रियाएं ( आवश्यकताओं अथवा एक खास ढंग की सक्रियता के लिए प्रेरणाओं का पैदा होना, निर्णय करना और उन्हें अमली रूप देना ) ;  संवेगात्मक प्रक्रियाएं ( भावनाओं का पैदा होना और आवश्यकताओं की तुष्टि, आदि पर निर्भर उनका विकास )।

मानसिक अवस्थाओं में भावनाओं की अभिव्यक्तियां ( चित्तवृत्ति, भाव ) , ध्यान ( एकाग्रता अथवा अन्यमनस्कता ) , संकल्प ( आत्मविश्वास अथवा आत्मसंदेह ) , चिंतन ( शंका ) , आदि आते हैं। मानसिक गुणों अथवा व्यक्तित्व की विशेषताओं में व्यक्ति के मन तथा चिंतन की विशेषताओं, उसके इच्छामूलक क्षेत्र की स्थायी विशेषताओं, जो उसके चरित्र, स्वभाव तथा योग्यताओं में साकार बनती हैं, एक निश्चित ढंग से कार्य करने की पहले से विद्यमान अथवा नयी पैदा हुई प्रेरणाओं, स्वभाव ( उत्तेजनशीलता अथवा भावुकता ) , आदि को शामिल किया जाता है।

बेशक सभी मानसिक परिघटनाओं का उपरोक्त तीन श्रेणियों में विभाजन सर्वथा पारिस्थितिक या सशर्त है। “मानसिक प्रक्रिया” की संकल्पना मनोविज्ञान द्वारा स्थापित परिघटना अथवा तथ्य के अस्थिर, गतिशील स्वरूप पर जोर देती है। इसके विपरीत “मानसिक अवस्था” की संकल्पना में मनोवैज्ञानिक तथ्य के अपेक्षाकृत स्थिर तथा स्थायी होने की मान्यता सम्मिलित है, जबकि “मानसिक गुण” अथवा “विशेषता” में व्यक्तित्व की दत्त विशेषता की स्थिरता पर, उसके स्थायी अथवा आवर्ती स्वरूप पर जोर दिया होता है। किसी भी मानसिक परिघटना ( उदाहरणार्थ, भावनाओं के सहसा उभार ) को समान रूप से मानसिक प्रक्रिया भी कहा जा सकता है ( क्योंकि वह भावात्मक अवस्था की गतिकी को, उसके मंच-सरीखे स्वरूप को अभिव्यक्त करती है ) और मानसिक अवस्था भी ( क्योंकि वह एक निश्चित काल-खंड में मानसिक क्रिया की विशेषता होती है ) तथा व्यक्तित्व की विशेषता की अभिव्यक्ति भी ( क्योंकि इससे व्यक्ति की उत्तेजनशीलता, संयमहीनता जैसे गुण सामने आते हैं )।

सामान्य मनोविज्ञान के मुख्य प्रश्नों के समाधान की कुंजी वस्तुसापेक्ष सक्रियता तथा संप्रेषण में व्यक्तित्व के विकास का सिद्धांत है। वह व्यक्ति को संप्रेषण तथा सक्रियता के कर्ता के रूप में आगे लाता है, उसके संज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा इच्छामूलक क्षेत्रों पर ध्यान संकेंद्रित करता है और उसकी मुख्य मनोवैज्ञानिक विशेषताएं ( स्वभाव, चरित्र, योग्यताएं ) दिखाता है।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

व्यवहारवाद और मनोविश्लेषण ( फ़्रायडवाद )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां मन और मस्तिष्क पर एक संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत की गयी थी। इस बार समकालीन मनोविज्ञान की दो अन्य महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों व्यवहारवाद तथा मनोविश्लेषण पर संक्षिप्त आलोचनात्मक चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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व्यवहारवाद और मनोविश्लेषण

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, मानसिक परिघटनाओं की समझ और मन की समस्या के प्रति नज़रिया और पद्धतियां, अध्येताओं के विश्व-दृष्टिकोण तथा समाज के प्रति उनके रवैये पर निर्भर होती हैं। इसलिए ही समकालीन मनोविज्ञान भी बहुतेरे मनोविज्ञानियों के प्रतिगामी विचारों और प्रगतिशील संकल्पनाओं के बीच संघर्ष का अखाड़ा बना हुआ है। कई विकसित देशों में मनोविज्ञान के क्षेत्र में आज भी मुख्यतः वे प्रवृतियां छायी हुई हैं, जो २०वीं शती के आरंभ में पैदा हुई थीं और गत कई दशकों में अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान काफ़ी कुछ बदल गई हैं। इनमें निश्चय ही सबसे अधिक प्रभावशाली व्यवहारवाद तथा मनोविश्लेषण हैं।

एडवर्ड थार्नडाइक
व्यवहारवाद का जन्म संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ था और एडवर्ड थार्नडाइक, जेम्स वाटसन, आदि को उसका जनक माना जाता है, जिन्होंने पशुओं के जीवन तथा व्यवहार के बारे में उल्लेखनीय खोजें की थीं। व्यवहा्रवाद चेतना और मन को मनोवैज्ञानिक अध्ययन का विषय नहीं मानता। उसके अनुसार मनोविज्ञान को केवल व्यवहार तथा परिवेश के परस्परसंबंध की नियमसंगतियों से सरोकार रखना चाहिए। व्यवहारवादियों के मत में, मनोवैज्ञानिक अध्ययन का उद्देश्य इंद्रियों को प्रभावित करने वाले उद्दीपनों ( S ) की प्रतिक्रिया ( R ) का पूर्वानुमान करना या इसके विपरीत, यदि प्रतिक्रिया मालूम है, तो उद्दीपन को जानना है। क्लासिकल व्यवहारवाद का फ़ार्मूला S →R है। व्यवहारवादी मनोविज्ञान आद्योपांत यंत्रवादी है और पशुओं की भांति मनुष्य को भी एक निष्क्रिय क्रियातंत्र अथवा एक तरह का यंत्र मानता है जो मन से युक्त हो या न हो, बाह्य प्रभावों पर प्रतिक्रिया अवश्य करेगा।

उद्दीपन और प्रतिक्रिया के बीच संबंध ( S →R ) को, अर्थात मस्तिष्क के ‘निवेश’ तथा ‘निर्गम’ के बीच संबंध को दर्ज़ करते हुए व्यवहारवाद ने ‘निवेश’ और ‘निर्गम’ के बीच के क्षेत्र को वैज्ञानिक विश्लेषण की पहुंच से बाहर ( ‘ब्लैक बॉक्स’ ) घोषित किया, क्योंकि उसका प्रत्यक्ष प्रेक्षण संभव नहीं है। व्यवहारवादियों ने अपने प्रयोग मुख्यतः जानवरों ( ज़्यादातर सफ़ेद चूहों ) पर किये और उनसे जिन निष्कर्षों पर पहुंचे, उन्हें मनुष्यों पर भी जस का तस लागू किया। ऐसा करते हुए उन्होंने मानव-व्यक्तित्व की क्रियाशीलता को तनिक भी ध्यान में नहीं रखा। इतनी ही यंत्रवादी उनकी शिक्षण की प्रक्रिया की समझ थी। पशुओं की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करते हुए व्यवहारवादी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि समस्या को केवल प्रयत्न-त्रुटि प्रणाली से हल किया जा सकता है। उनके अनुसार इस प्रणाली का सार यह है कि आंख मीचकर चुनी हुई बेतरतीब हरकतें तब तक जारी रखी जाएं, जब तक कोई एक हरकत वांछित फल न दे दे। व्यवहारवादियों ने उपरोक्त निष्कर्ष मनुष्य पर भी लागू किया और पशुओं तथा मनुष्य के व्यवहार में कोई गुणात्मक अंतर नहीं देखा।

सिगमंड फ़्रायड
२०वीं शती के पश्चिमी मनोविज्ञान में दूसरी प्रभावशाली प्रवृति मनोविश्लेषण है, जिसे आस्ट्रियाई मनश्चिकित्सक तथा मनोविज्ञानी सिगमंड फ़्रायड  के नाम से फ़्रायडवाद भी कहा जाता है। फ़्रायड द्वारा प्रतिपादित मत के अनुसार मनुष्य की प्रकृति तथा क्रियाशीलता उसकी अपने पशु पूर्वजों से विरासत में पाई गई सहजवृतिक अंतःप्रेरणाओं, विशेषतः काम-प्रवृत्ति और आत्मरक्षा की प्रवृत्ति से पैदा होती हैं। फिर भी मानव समाज में सहजवृत्तियां सामाजिक प्रतिबंधों तथा वर्जनाओं के कारण अपने को पशुओं जैसे खुलकर प्रकट नहीं कर सकती और मनुष्य उनका दमन करने को विवश होता है। इस प्रकार सहजवृत्तिक आवेग शर्मनाक, अनुचित तथा कलंककारी बनकर मनुष्य के चेतन जीवन से विस्थापित होकर अवचेतन के क्षेत्र में पहुंच जाते हैं। फ़्रायडवाद के दृष्टिकोण से मनुष्य का व्यवहार दो तत्वों से निदेशित होता है: “आनंद का तत्व“, जिससे आशय मुख्यतः कामेच्छा की अभिव्यक्ति से है, और “वास्तविकता का तत्व“, जो कामवृत्ति को लज्जाजनक तथा वर्जित मानकर दबाने की, समाज की मांगों का परिणाम होता है। आनंद और वास्तविकता के तत्वों के बीच टकराव के फलस्वरूप “अतुष्ट” वृत्तियां अथवा इच्छाएं, अचेतन के क्षेत्र में स्थानांतरित हो जाती हैं, जहां से वे मनुष्य के व्यवहार का नियंत्रण करती हैं। अवचेतन में सहजवृत्तिक अंतःप्रेरणाएं अपने मूल के अनुसार विभिन्न “मनोग्रंथियों” अथवा अचेतन मानसिक संरचनाओं (  विचारों और आवेगों के पुंजों ) में विलयित हो जाती हैं, जिन्हें ही व्यक्ति की क्रियाशीलता का वास्तविक कारण बताया जाता है।

व्यवहारवादियों की भांति ही फ़्रायडवादी भी मन की भूमिका को नगण्य मानकर उसकी अवज्ञा करते हैं। अचेतन मानसिक शक्तियों और मूलतः मानव-द्वेषी सामाजिक परिवेश के बीच लगातार संघर्ष की धारणा को आधारबिंदु बनाकर मनोविश्लेषकों ने दावा किया कि व्यक्ति के भाग्य में आंतरिक द्वंद की अवस्था में रहना लिखा हुआ है। क्योंकि एक ओर समाज उससे सामाजिक वर्जनाओं के रूप में, जिन्हें कि व्यक्ति, अंतरात्मा की आवाज़, लज्जा, भय, आदि की शक्ल में आत्मपरक तौर पर अनुभव करता है ( “चेतना की सेंसरशिप“), असंगत मांगें करता है और दूसरी ओर अचेतन प्रवृत्तियां उस पर अपना दबाव डालती रहती हैं। इस असह्य तनाव को कम करने के लिए मनुष्य मनोवैज्ञानिक रक्षा के क्रियातंत्रों को सक्रिय बनाता है, जो उसकी काम-शक्ति को समाज द्वारा स्वीकार्य दिशाओं में प्रवृत्त कर देते हैं। वयस्क मनुष्य के व्यवहार के अचेतन मार्गदर्शक पूरी तरह आवेगों द्वारा नियंत्रित होते हैं, जो आरंभिक बाल्यावस्था में ही बन गये थे और जीवन भर लगभग अपरिवर्तित रहते हैं, हालांकि चेतना की “सेंसरशिप” के अनुरूप होने की आवश्यकता के कारण वे थोड़ा सा छद्मरूप जरूर धारण कर लेते हैं।

फ़्रायडपंथियों ने व्यक्तित्व के आगे के भी सारे विकास की कल्पना अवचेतन में विस्थापित विभिन्न मनोग्रंथियों के बीच टकराव के रूप में की। फ़्रायड और उसके अनुयायियों के अनुसार मनोविज्ञान का एक मुख्य उद्देश्य अवचेतन मनोग्रंथियों को उघाड़ना तथा मनोविश्लेषण के जरिए उन्हें रोगी की चेतना में लाना तथा इस प्रकार व्यक्तित्व के आंतरिक द्वंदों की संभावना को ख़त्म करना है ( मनोविश्लेषण की प्रणाली )।

फ़्रायड ने अचेतन अभिप्रेरण, मनोवैज्ञानिक रक्षा, वयस्क के व्यवहार पर बाल्यावस्था के चोट पहुंचानेवाले अनुभवों के प्रभाव, आदि समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया, किंतु उन्होंने चेतना की तुलना में अचेतन तत्व को प्राथमिकता दी थी और मनुष्य के व्यवहार को कामेच्छाओं से निदेशित माना। फ़्रायड व्यक्ति की क्रियाशीलता की पशुओं की सहजवृत्तियों से समानता देखते हैं और उसे बुनियादी तौर पर एक अचेतन परिघटना मानते हैं। सामाजिक परिवेश का काम प्राकृतिक आवेगों पर प्रतिबंध या “सेंसरशिप” लगाने तक सीमित कर दिया गया। मनुष्य को सामाजिक नहीं, बल्कि जैविक प्राणी समझने की यह संकल्पना इस पूर्वधारणा पर आधारित है कि मनुष्य और समाज सारतः एक दूसरे के लिए पराए हैं तथा समाज मनुष्य को सदा दबाता रहता है और अचेतन में आक्रामकता, विक्षिप्ति, आदि के रूप में विद्रोह का शाश्वत ख़तरा हमेशा मंडराता रहता है। इस तरह उन्होंने व्यक्ति के मनोविज्ञान को को जैव धारणाओं की दृष्टि से देखा और उसे मूलतः समाज-उदासीन तक घोषित कर डाला। फ़्रायड ने अपने मनोवैज्ञानिक सिद्धांत को मनुष्य, समाज तथा संस्कृति के सामान्य सिद्धांत में परिवर्तित किया और इस तरह विश्व में बड़ा नाम और प्रभाव कमाया।

आज व्यवहारवाद और फ़्रायडवाद के आरंभिक “क्लासिकल” रूप का स्थान बहुत-सी नई प्रवृत्तियों यथा नवव्यवहारवाद, नवफ़्रायडवाद, आदि ने ले लिया है, जिनमें मूल सिद्धांतों के विभेदक लक्षणों को कुछ गौण, अस्पष्ट बना दिया गया है। उनमें यंत्रवाद और प्रत्ययवाद की छाया को चतुराई से छिपा दिया गया है, किंतु इस सतही परिवर्तन के बावज़ूद इन प्रवृत्तियों की मुख्य वैचारिक दिशा ज्यों की त्यों रही है।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

मन और मस्तिष्क

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में दिये जाने की योजना है। पिछली बार यहां मन के परावर्ती स्वरूप पर एक संक्षिप्त दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया था। इस बार मन और मस्तिष्क पर थोड़ी और चर्चा करेंगे। पहले यहां इसी संदर्भ में कुछ चर्चाएं की जा चुकी हैं जिनके लिंक यथोचित स्थान पर दे दिये गये हैं, जो भी मानवश्रेष्ठ चाहें उनसे भी लाभांवित हो सकते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मन और मस्तिष्क

मन मस्तिष्क का प्रकार्य है। किसी भी अवयवी की मानसिक क्रिया बहुसंख्य विशिष्ट शारीरिक युक्तियों के माध्यम से संपन्न होती है। इनमें से कुछ बाह्य प्रभावों को ग्रहण करने वाली युक्तियों का काम करती हैं, कुछ इन प्रभावों को संकेतों में बदलती, व्यवहार की योजना बनाती तथा उसे क्रियान्वित करती हैं, कुछ का काम व्यवहार को आवश्यक ऊर्जा तथा आवेग प्रदान करना होता है और कुछ पेशियों, आदि को सक्रिय बनाती हैं। अवयवी का यह सारा जटिल कार्य, उसे अपने को परिस्थिति के अनुकूल ढ़ालने और जीवनीय समस्याएं हल करने की संभावनाएं देता है।

जीवजगत के, अमीबा से लेकर मनुष्य तक दीर्घ उदविकास के दौरान व्यवहार के शरीरक्रियात्मक तंत्र उत्तरोत्तर ज़्यादा पेचीदे, विभेदीकृत, लचीले और पर्यावरण के अनुकूल बनते गये हैं। अंगों के विशिष्टीकरण और जीवन के लिए उनके बीच निरंतर संपर्क और गतियों के समन्वय की जरूरत के चलते,  मुख्य नियंत्रण पटल अर्थात केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क का विकास हुआ। केंद्रीय तंत्रिका-तंत्र के सभी भागों की संरचना अत्यंत जटिल है और शरीररचनाविज्ञान और ऊतकविज्ञान उनका अध्ययन करते हैं। यहां हम उनके विस्तार में नहीं जाएंगे, परंतु यदि कुछ जिज्ञासू चाहें तो पूर्व की प्रविष्टियों : “जीवन का क्रम-विकास और तंत्रिका तंत्र की उत्पत्ति”, “सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन”, तथा “मानसिक क्रियाकलाप के भौतिक अंगरूप में मस्तिष्क” को पढ़ कर कुछ इशारे पा सकते हैं, जिज्ञासा को थोड़ा तुष्ट कर सकते हैं।

आधुनिक विज्ञान मेरू-रज्जु तथा प्रमस्तिष्कीय स्कंध को मुख्य रूप से परावर्ती क्रिया के सहज रूपों ( अननुकूलित प्रतिवर्तों ) के अधिष्ठान मानता है, जबकि प्रमस्तिष्कीय गोलार्धों की प्रांतस्था व्यवहार के मन द्वारा नियंत्रित तथा जन्मोपरांत उपार्जित रूपों का अंग है। यह जानना दिलचस्प रहेगा कि, मनुष्य के प्रमस्तिष्कीय गोलार्धों की प्रातंस्था के काफ़ी बड़े भाग में हाथों और विशेषतः अंगु्ठों की, जो मनुष्यों में अन्य सभी उंगलियों के आमने-सामने आने की क्षमता रखते हैं, क्रिया से जुड़ी हुई कोशिकाएं और वाक् के अंगों – होठों तथा जिह्वा – की पेशियों के कार्य से जुड़ी हुई कोशिकाएं होती हैं। इस प्रकार मनुष्य के प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध मुख्य रूप से उन प्रेरक अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी श्रम तथा संप्रेषण में मुख्य भूमिका होती है

मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं के मस्तिष्कीय तंत्रों और पशुओं के मानस के तंत्रों में काफ़ी समानताएं हैं। सभी स्तनपायी प्राणियों में तंत्रिका तंत्र की संरचना तथा संक्रिया के सामान्य सिद्धांत एक जैसे हैं। इसलिए शरीरक्रियाविज्ञान और मनोविज्ञान, दोनों के लिए पशुओं के मस्तिष्क का अध्ययन बहुत ही महत्वपूर्ण है। किंतु हमें मनुष्य की मानसिक प्रक्रिया और पशुओं की मानसिक ल्रिया के बीच जो बुनियादी भेद हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए। ये भेद परिमाणात्मक ही नहीं, बल्कि गुणात्मक भी हैं। वे श्रम की प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से आगे बढ़े और श्रम एक ऐसा सशक्त भौतिक कारण था कि जिसने मस्तिष्क समेत मनुष्य के शरीर के सभी अंगों की संरचना और कार्यों को बदल डाला। मनुष्य और पशुओं के मानस में भेदों पर एक चर्चा हम यहां पहले ही कर चुके हैं, और बाद में भी इसे विस्तार से देखने की कोशिश करेंगे।

मनुष्य के मनोजीवन में ललाट खंडों की भूमिका विशेषतः महत्वपूर्ण है। प्रांतस्था की तीस प्रतिशत सतह पर ये ही खंड स्थित हैं। बीमारी या चोट आदि के कारण उन्हें पहुंची क्षति से व्यवहार के सामान्य ही नहीं, अपितु उच्चतर रूप भी प्रभावित होते हैं। उदाहरणार्थ, जिन रोगियों के ललाट खंड क्षतिग्रस्त हैं, उनकी देखने, बोलने तथा लिखने की क्षमता तो बनी रहती है, किंतु यदि उनसे गणित का कोई सवाल हल करने को कहा जाए तो वे उसकी शर्तों का विश्लेषण करने का प्रयत्न भी नहीं करते। हल की योजना बनाते हुए वे अंतिम प्रश्न तक को भूल जाते हैं और अपनी त्रुटियों पर ध्यान नहीं देते हैं। बहुत से नैदानिक तथ्य दिखाते हैं कि मस्तिष्क के ललाट खंडों को क्षति पहुंचने से बौद्धिक योग्यताओं के घटने के साथ-साथ कई तरह की व्यक्तित्व तथा स्वभाव संबंधी गड़बड़ियां पैदा हो जाती हैं। इस तरह जो पहले शिष्ट तथा संयतस्वभाव माने जाते थे, वे अब असंयत, अशिष्ट और सहसा तैश में आ जानेवाले बन जाते हैं।

यह पाया गया है कि प्रमस्तिष्क के दायें तथा बायें गोलार्धों के मानसिक प्रकार्य कुछ हद तक बँटे हुए हैं। बिंबों और शब्दों के रूप में सूचना का ग्रहण तथा संसाधन दोनों गोलार्धों द्वारा किया जाता है, फिर भी वे जो कार्य करते हैं उनमें काफ़ी स्पष्ट अंतर है। इस तरह कहा जा सकता है कि मस्तिष्क में क्रियात्मक असममिति होती है। बायां गोलार्ध पढ़ने, गिनने और सामान्यतः संकेतों ( शब्दों, प्रतीकों, आकृतियों, आदि ) से काम लेने से संबंध रखता है। उसकी बदौलत तार्किक निर्मितियां बनायी जाती हैं, जिनके बिना विश्लेषणात्मक  चिंतन असंभव है। बायें गोलार्ध की क्रिया में गड़बड़ी से वाग्दोष ( भाषणघात ) पैदा होते हैं, सामान्य संप्रेषण कठिन हो जाता है और यदि तंत्रिका ऊतक को व्यापक क्षति पहुंची है, तो सोचने की क्षमता में भारी कमी आ जाती है। दायां गोलार्ध बिंबात्मक सूचना से काम लेता है, दिगविन्यास तथा संगीत की रसानुभूति में मदद करता है और जानी तथा समझी जा रही वस्तुओं के प्रति मनुष्य के भावात्मक रवैये का निर्धारण करता है। दोनों गोलार्धों के बीच क्रियात्मक अंतर्संबंध होते हैं। किंतु क्रियात्मक असममिति केवल मनुष्य में पाई जाती है।

प्रमस्तिष्क बहुत सारे अंगों की एक जटिल प्रणाली है, जिनकी क्रिया उच्चतर प्राणियों और मनुष्यों के मन अथवा मानस का सारतत्व है। मन की अंतर्वस्तु बाह्य विश्व से निर्धारित होती है, जिससे जीवधारी अन्योन्यक्रिया करता है। मानव-मस्तिष्क के लिए बाह्य विश्व मात्र जैव परिवेश ही नहीं है ( जैसा कि यह पशुओं के मस्तिष्क के लिए भी है ), बल्कि अपने सामाजिक इतिहास के दौरान लोगों द्वारा बनायी गई वस्तुओं एवं परिघटनाओं का विश्व भी है। मनुष्य जब जीवन में पहले डग भरता है, तभी से उसके मानसिक विकास की जड़े मानव संस्कृति के इतिहास की गहराईयों में होती हैं

मनुष्य के मस्तिष्क में यथार्थ के प्रतिबिंब के तौर पर मन के कई स्तर होते हैं, जिन पर हम पूर्व में भी चर्चा कर चुके हैं। इसके लिए चेतना की संकल्पना नामक प्रविष्टि को देखा जा सकता है। आप मन, चिंतन और चेतना शीर्षक प्रविष्टि पर भी नज़र डाल सकते हैं।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

मन का परावर्ती स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में दिये जाने की योजना है। पिछली बार यहां मन के संदर्भ में पैदा हुई धारणाओं के विकास का संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण का दूसरा हिस्सा प्रस्तुत किया गया था। इस बार मन के परावर्ती स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मन का परावर्ती स्वरूप
सचेतन और अचेतन जीवन की सभी क्रियाएं अपने मूल की दृष्टि से प्रतिवर्त ( reflex ) हैं। इस प्रकार चेतना का कार्य ( मानसिक परिघटना ) अमूर्त आत्मा का गुण नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है जो अपनी उत्पत्ति के तरीके की दृष्टि से प्रतिवर्त के सदॄश है। मानसिक परिघटना सिर्फ़ वह नहीं है, जो मनुष्य अपने संवेदनों, विचारों और भावनाओं का प्रेक्षण करने पर पाता है। प्रतिवर्त की भांति उसमें भी बाह्य क्षोभक ( exciter ) का प्रभाव और इसके उत्तरस्वरूप हुई क्रिया शामिल रहते हैं। हमारी चेतना में विद्यमान बिंब, धारणाएं और विचार, उन अविभाज्य मानसिक प्रकियाओं के केवल कुछ पहलू ही हैं, जो परिवेश के साथ अवयवी की अन्योन्यक्रिया का एक विशेष रूप हैं। यह एक बड़ा भ्रम है कि मानसिक प्रक्रियाएं चेतना में आरंभ होती हैं और चेतना में ही ख़त्म भी हो जाती हैं।

प्रतिवर्त की मस्तिष्क से संबद्ध कड़ी को उसके नैसर्गिक मूल ( ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव ) और अंत ( अनुक्रियात्मक गति ) से अलग करना ठीक नहीं है। मानसिक परिघटना एक अविभाज्य परावर्ती क्रिया में उत्पन्न होती है, उसका उत्पाद बनती है, किंतु इसके साथ ही वह एक ऐसा कारक भी होती है, जिसका कोई कार्यमूलक परिणाम ( क्रिया, गति ) अवश्य निकलता है

मानसिक प्रक्रियाओं की भूमिका क्या है? वे संकेत ( indicator ) अथवा नियामक ( regulator ) का कार्य करती हैं। इसका मतलब उनकी भूमिका, क्रिया को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप बनाना और इस तरह उपयोगी एवं अनुकूली प्रभाव सु्निश्चित करना है। मानसिक क्रियाएं स्वयंमेव नहीं, अपितु बाह्य जगत से संबंधित सूचनाएं मस्तिष्क के जिन प्रभागों में पहुंचती हैं, सुरक्षित रहती हैं तथा संसाधित होती हैं, उन प्रभागों के गुण अथवा प्रकार्य के रूप में ही , जवाबी क्रिया की नियामक होती हैं। इस प्रकार प्रतिवर्त की क्रिया में मनु्ष्य का परिवेश विषयक ज्ञान तथा धारणाएं, अर्थात व्यक्ति का समस्त अनुभव भी सम्मिलित रहता है। मानसिक परिघटना बाह्य, अर्थात परिवेश के प्रभाव और आंतरिक, अर्थात एक शारीरिक तंत्र के रूप में अवयवी की अवस्थाओं के प्रभाव का, मस्तिष्क द्वारा प्रदत्त उत्तर ( मस्तिष्क की प्रतिक्रिया ) है।

मानसिक परिघटनाएं, मनुष्य के क्षोभों के उत्तर में पैदा होनेवाली क्रियाशीलता के वे स्थायी नियामक हैं, जो इस समय सक्रिय हैं ( संवेदन, प्रत्यक्ष ) अथवा पहले कभी, यानि विगत अनुभव में सक्रिय थे ( स्मृति ) , जो इन प्रभावों का सामान्यीकरण करते तथा वे जिन परिणामों पर पहुंचाएंगे, उनका पूर्वानुमान सुनिश्चित बनाते हैं ( चिंतन, कल्पना ), जो कुछ प्रभावों के अंतर्गत क्रियाशीलता को बढ़ाते हैं तथा कुछ के अंतर्गत उसे घटाते अथवा अवरुद्ध करते हैं ( भावनाएं, इच्छा ) और जो लोगों के व्यवहार में भिन्नता पैदा करते हैं ( स्वभाव, चरित्र, इत्यादि )

इस तरह मन के परावर्ती स्वरूप और मनुष्य के क्रियाकलाप के मन द्वारा नियमन का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। आगे चलकर इस महती सैद्धांतिक प्रस्थापना की प्रयोगों द्वारा पुष्टि हुई, और बाह्य परिवेश से जीवों की और मनुष्य की भी अन्योन्यक्रिया का मस्तिष्क द्वारा नियंत्रण किये जाने के नियमों का अविष्कार किया गया। इन नियमों की समष्टि को सामान्यतः दो संकेत पद्धतियों का सिद्धांत कहा जाता है।

वस्तु का बिंब ( दृश्य, श्रव्य, घ्राणजनित, इत्यादि ) जीव के लिये किसी क्षोभक के संकेत का कार्य करता है, जिससे उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है और यह अनुकूलित प्रतिवर्त कहलाता है।

जैसा कि ज्ञात है, अनुकूलित ( conditioned ) प्रतिवर्त इससे पैदा होता है कि किसी अनुकूलित क्षोभक ( उदाहरणार्थ जलती-बुझती बत्ती ) का किसी अननुकूलित ( unconditioned ) उत्तेजक की क्रिया ( उदाहरणार्थ, खाने की वस्तु देना ) से संयोजन किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क में दो केंद्रों ( दृष्टि और आहार से संबंधित केंद्रों ) के बीच अल्पकालिक तंत्रिका संपर्क उत्पन्न हो जाता है और जीव के दो क्रियाकलाप ( दृष्टि और आहार से संबंधित क्रियाकलाप ) आपस में जुड़ जाते हैं। बत्ती का जलना-बुझना जीव के लिए खाना दिये जाने का संकेत बन जाता है और उसके मुंह से लार टपकने लग जाती है।

जीव-जंतु अपने व्यवहार में संकेतों से निर्देशित होते हैं, जिन्हें पहली संकेत प्रणाली के संकेत ( “पहले संकेत” ) कहा गया। जीवों का सारा मानसिक क्रियाकलाप पहली संकेत प्रणाली के स्तर पर संपन्न होता है। मनुष्य के मामले में भी पहली संकेत प्रणाली के संकेत ( ठोस बिंब, धारणाएं ) काफ़ी बड़ी भूमिका निभाते हैं और उसके व्यवहार का नियमन व निर्देशन करते हैं। उदाहरण के लिए, चौराहे की लाल बत्ती, वाहन के चालक के लिए संकेतमूलक क्षोभ होती है तथा उससे कई सारी आंगिक क्रियाएं करवाती है, जिनके फलस्वरूप चालक ब्रेक लगाता है और वाहन को रोक देता है। उल्लेखनीय है कि संकेतमूलक क्षोभ स्वयं ही यांत्रिकतः मनुष्य के व्यवहार का नियमन नहीं करते, बल्कि यह कार्य मस्तिष्क में उनके बिंबरूप संकेतों द्वारा किया जाता है। ये पहले से अनुकूलित बिंबरूप संकेत वस्तुओं के बारे में सूचना देते हैं और इस तरह से मनुष्य के व्यवहार का नियमन करते हैं।

जीवों के विपरीत मनुष्य में पहली संकेत प्रणाली के अतिरिक्त दूसरी संकेत प्रणाली भी होती है, जो केवल उसी की खूबी है। इस प्रणाली के संकेत हैं शब्द ( “दूसरे संकेत” ), जिन्हें बोला, सुना या पढ़ा जाता है। शब्द की मदद से से पहली संकेत प्रणाली के संकेतों, बिंबरूप संकेतों को संप्रेषित अथवा प्रतिस्थापित किया जा सकता है। शब्द उनकी जगह ले लेता है, उनका सामान्यीकरण करता है और वे ही क्रियाएं करवा सकता है, जो पहली संकेत प्रणाली के संकेतों द्वारा करवायी जाती है। इस तरह शब्द “संकेतों का संकेत” है। संकेतमूलक क्षोभों ( उच्चारित ध्वनि, लेख ) का इन शब्दमूलक क्षोभों के बिंब के नाते मस्तिष्क में शब्द के अर्थ के रूप में विद्यमान संकेतों से अंतर किया जाना चाहिए। मनुष्य द्वारा समझे जाने पर शब्द उसके व्यवहार का नियमन करता है तथा परिवेशी विश्व में उसे मार्ग दिखाता है। यदि शब्द को समझा नहीं जाता तथा वह बेमानी ही रहता है, तो वह मनुष्य को मात्र पहली संकेत प्रणाली के संकेत के तौर पर प्रभावित करेगा अथवा उदासीन ही छोड देगा। इसी से संबंधित करके कुछ पशुओं को ध्वनि-शब्दों के जरिए किसी विशेष व्यवहार को किये जाने के लिए दी जाने वाली प्रशिक्षण प्रक्रिया को समझा जा सकता है, पशुओं के लिए उच्चारित किये जाने वाले शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता, वे सिर्फ़ अनुकूलित प्रतिवर्त के लिए क्षोभकों का कार्य करते हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि परावर्तन का सिद्धांत ( पहले इस पर चर्चा की जा चुकी है ) ही वैज्ञानिक मनोविज्ञान का ज्ञानमीमांसीय आधार है। दार्शनिकतः परिभाषा दी जाए तो मन वस्तुगत विश्व का आत्मपरक बिंब है, मस्तिष्क में यथार्थ की प्रतिछाया है। मन परावर्तन की प्रक्रिया है और परावर्तन मस्तिष्क का गुण है। परावर्तन सिद्धांत मानसिक परिघटनाओं के बारे में प्रत्ययवादी और यंत्रवादी, दोनों तरह के दृष्टिकोणों का खंड़न करता है। प्रत्ययवाद मन को पदार्थ से अलग करके परिवेशी वास्तविकता से स्वतंत्र, बंद, अंतर्जगत बना ड़ालता है, वहीं यंत्रवाद पदार्थ से मन के गुणात्मक अंतर को नहीं देख पाता और उसे मात्र तंत्रिकीय प्रक्रियाओं तक सीमित कर देता है।

क्रियाशीलता मन की विशेषता है। अभिप्रेरण, सर्वोत्तम समाधान की सक्रिय खोज और संभावित व्यवहार के विभिन्न रूपांतरों में से किसी एक का चयन उसका एक अनिवार्य पहलू है। मानसिक परावर्तन दर्पणवत् या निष्क्रिय नहीं होता, अपितु उसके साथ तलाश, चयन, क्रिया के विभिन्न रूपांतरों का मूल्यांकन जुड़े होते हैं। वह व्यक्ति के क्रियाकलाप का एक अनिवार्य पक्ष है। व्यवहार के सक्रिय नियमन के लिए प्रतिपुष्टि ( feedback ) के तंत्र का काम करना आवश्यक है। मनोविज्ञान और शरीरक्रियाविज्ञान में इसका अर्थ यह है कि मस्तिष्क द्वारा हर प्रतिक्रिया को हल की जा रही समस्या के दृष्टिकोण से आंका जाता है। प्रतिपुष्टि-तंत्र की मदद से क्रिया के परिणाम की उस बिंब से तुलना की जा सकती है, जो इस परिणाम से पहले पैदा होता है और यथार्थ के एक विशिष्ट मॉडल के नाते उसका पूर्वाभास देता है।

मन मनुष्य को क्रमबद्ध क्रियाओं की योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन से पहले कई सारी मानसिक क्रियाएं ( जैसे कि सर्वोत्तम तरीके के चयन से संबंधित क्रियाएं ) पूरी करने में समर्थ बनाता है। जैव उद्‍विकास की प्रक्रिया में आचरण के एक नियंत्रण-तंत्र के रूप में विकसित हो्कर मनुष्य का मन, गुणात्मकतः बिल्कुल भिन्न बन जाता है। सामाजिक जीवन के नियमों के प्रभाव से लोग व्यक्ति बन जाते हैं और हर कोई अपने पर उन ठोस ऐतिहासिक परिस्थितियों की छाप लिये होता है, जिनमें उसका व्यक्तित्व ढ़ला था। परिणाम के तौर पर मनुष्य के व्यवहार में व्यक्तित्वमूलक विशेषताएं आ जाती हैं

अब हम मनोविज्ञान की विषय-वस्तु की पहले दी गयी परिभाषा को अधिक ठोस और सुस्पष्ट बना सकते हैं: मनोविज्ञान मन, जो कि मस्तिष्क में बनने वाला और मनुष्य को अपने व्यक्तित्वमूलक विशेषताओं से युक्त व्यवहार तथा क्रियाकलाप का नियंत्रण करने में समर्थ बनानेवाला यथार्थ का बिंब है, के तथ्यों , नियमों और क्रियातंत्रों का अध्ययन करता है
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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय