भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मानव चेतना के आधार के एक रूप में भाषा और इसके जरिए चिंतन के विकास पर चर्चा की थी। इस बार हम भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा करेंगे। चेतना पर शुरू हुई यह श्रृंखला धीरे-धीरे अपने अंत की ओर बढ़ रही है।

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।

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भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव
( the Relative character of the Opposition of Matter and Consciousness )

अब तक का श्रृंखलित विवेचन, दर्शन के बुनियादी सवाल के जवाब के मद्देनज़र चेतना की उत्पत्ति और भूतद्रव्य के साथ उसके संबंधों की विस्तृत पड़ताल कर रहा था। हमने यह जाना कि भूतद्रव्य के विपरीत चेतना शाश्वत नहीं है। यह भूतद्रव्य के विकास का एक उत्पाद है। यह भी कि चेतना भूतद्रव्य के एक विशेष अनुगुण, अर्थात परावर्तन ( reflection ), का उच्चतम और सर्वाधिक जटिल रूप है।

भूतद्रव्य चेतना के बिना विद्यमान हो सकता है और क्रमिक विकास के दौरान चेतना से पहले मौजूद था, किंतु चेतना भूतद्रव्य के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकती है। इस अर्थ में यह द्वितीयक तथा व्युत्पन्न है, और इसी में भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता निहित है। हमारे गिर्द वस्तुएं भौतिक हैं, जबकि चेतना ( जो हमारे मस्तिष्कों में उत्पन्न होती है ) प्रत्ययिक ( ideal ) है, इसमें भी इनकी प्रतिपक्षता व्यक्त होती है। परंतु यह प्रतिपक्षता स्वयं में निरपेक्ष ( absolute ) नहीं, वरन सापेक्ष ( relative ) होती है। यह प्रतिपक्षता दर्शन के बुनियादी सवाल के संदर्भ में ही सार्थक है, यानि जब हमें यह जानने में दिलचस्पी होती है कि इनमें से कौन प्राथमिक है, चेतना भूतद्रव्य से कैसे संबधित है और क्या यह हमारे परिवेशीय जगत को जान सकती है।

मान लीजिए के हम अपने आसपास की वस्तुओं पर विचार कर रहे हैं, उन्हें जांच रहे हैं और उनका अध्ययन कर रहे हैं। चूंकि वे हमसे परे हैं और हमारे चेतना पर निर्भर नहीं हैं और हम अपने संवेद अंगों के जरिए उनके बारे में सूचना प्राप्त करते हैं, इसलिए हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि ये सब भूतद्रव्य ( matter ) हैं, यानि वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) हैं। इन वस्तुओं के बिंब, उनकी संकल्पनाएं और हमारे ज्ञान को व्यक्त करने वाले निर्णय और कथन हमारे मस्तिष्क में हैं, हमारी चेतना के अंग हैं और उस अर्थ में आत्मगत ( subjective ) हैं। इसलिए कुछ दशाओं में आत्मगतता, वस्तुतः हमारी चेतना में वस्तुगत यथार्थता का परावर्तन है। और इसी अर्थ में, चेतना, वस्तुगत यथार्थता के रूप में भूतद्रव्य के प्रतिपक्ष में है।

अब आगे यह मान लीजिए कि अपनी दिलचस्पी की भौतिक वस्तुओं के हमारे अध्ययन के दौरान कोई अन्य व्यक्ति हमारा निरिक्षण कर रहा है, हमें जांच रहा है और हमारे क्रियाकलाफ पर विचार कर रहा है। इस व्यक्ति और उसकी चेतना के लिए हम स्वयं और हमारे मस्तिष्क व उनके क्रियाकलाप उतने ही भौतिक हैं, जितने कि हमारे परिवेशीय जगत की अन्य वस्तुएं। फलतः वह हमें और हमारे मस्तिष्कों के क्रियाकलाप के उत्पादों को वस्तुगत यथार्थता मान सकता है, ऐसी चीज़ समझ सकता है, जो उसकी चेतना से परे तथा उसके मानसिक क्रियाकलाप के बाहर है। अतएव, हमारे क्रियाकलाप के संदर्भ में हमारा चिंतन और मन एक तरफ़ तो हमारे मस्तिष्क के परावर्तन के रूप में काम करते हैं और दूसरी तरफ़ , एक अन्य प्रेक्षक के लिए उसी समय वह उसकी चेतना से परे की वस्तुगत यथार्थता के रूप में भी हो सकते हैं। इसी तरह अपनी बारी में, हम भी इस प्रेक्षक की चेतना तथा मानसिक क्रिया को, ठीक वैसे ही, वस्तुगत यथार्थता मान सकते हैं।

इस तरह, हम देखते हैं कि भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को तय करते वक्त, वस्तुगत और आत्मगत एक दूसरे के प्रतिपक्ष में स्पष्टतः खड़े होते हैं और इसी से यह दर्शाया जा सकता है कि चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है।

हमने यह भी देखा कि यह प्रतिपक्षता सापेक्ष होती है, और चिंतन तथा मानसिक क्रियाकलाप की संकल्प तथा अनुभूतियों जैसी अन्य अभिव्यक्तियों के वैज्ञानिक अध्ययन के वक्त इस प्रतिपक्षता को अतिरंजित करना भारी भूल होगी। चूंकि मन, मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप में, काम में, भाषा संबंधी क्रियाकलाप आदि में प्रकट होता है, इसलिए भूतद्रव्य और चेतना की, दैहिक और मानसिक की प्रतिपक्षता तथा एक का दूसरे से पूर्ण बिलगाव, चेतना तथा अन्य मानसिक घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन में ही बाधक होगा। भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का स्वभाव सापेक्ष होता है। दर्शन के बुनियादी सवाल से निपटने के बाद इन्हें इसी अंतर्द्वंद में देखना चाहिए।
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इस बार इतना ही।
अगली बार हम चर्चा को आगे एक रूचिकर मोड़ देंगे और इस पर चर्चा करेंगे कि क्या कंप्यूटर भी सोच विचार कर सकते हैं। उसके बाद श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत करेंगे।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

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6 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    अप्रैल 03, 2010 @ 17:27:38

    समय जी,पिछले कुछ आलेख नहीं पढ़ सका था। लेकिन चेतना को आप किस तरह परिभाषित करते हैं? यह जानना चाहता हूँ। दर्शनशास्त्र में चेतना वह तत्व है जिस के अभाव में गति और परिवर्तन संभव नहीं है। यदि ऐसा है तो भूत द्रव्य और चेतना को पृथक कर पाना संभव नहीं हो सकता। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये दोनों उसी तरह एक ही वस्तु के दो पहलू हों? जिन्हें अलग किया जाना संभव ही न हो। जो जिस पहलू को देख रहा हो उसे ही परम सत्य मान रहा हो दूसरे को उस के अधीन?

    प्रतिक्रिया

  2. समय
    अप्रैल 03, 2010 @ 18:24:39

    आदरणीय द्विवेदी जी,चेतना ( consciousness ) को अद्यतन अर्थों में मानव के सापेक्ष ही देखा जाता है। इस हेतु यहां इस पर किया गया विवेचन आप इन लिंकित पोस्टों पर देख सकते हैं। चेतना को परिभाषित करने में इनसे मदद मिल सकती है।http://main-samay-hoon.blogspot.com/2009/08/blog-post.htmlhttp://main-samay-hoon.blogspot.com/2010/01/blog-post.htmlhttp://main-samay-hoon.blogspot.com/2010/01/blog-post_24.htmlआप दर्शनशास्त्र और चेतना तत्व का जिक्र, भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में कर रहे हैं। दर्शनशास्त्र अपनी प्राचीन सीमाओं का अतिक्रमण कर काफ़ी सुसंगत और वैज्ञानिक हो चुका है। भविष्य में कभी भारतीय दर्शन पर भी चर्चा करने की योजना है। अतः वह बाद में।चेतना की उत्पत्ति भूतद्रव्य ( matter ) के क्रमिक ऐतिहासिक विकास की काफ़ी बाद की परिघटना है। इससे पहले भूतद्रव्य के किसी भी पहलू के साथ नहीं रखा जा सकता। हां चेतना की उत्पत्ति हो जाने के बाद इन दोनों के पहलुओं को परखा जा सकता है।आज की यह चर्चा भी इसीलिए यही कहकर शुरू की गयी थी, कि यह थोड़ा अरुचिकर पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थपना पर है। भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता ( Opposition ) इनके बीच प्राथमिकता तय करते वक्त ही है, परंतु जब चेतना अस्तित्व में आ जाती है तो फिर इस प्रतिपक्षता का स्वभाव सापेक्ष हो जाता है। यानि कि बिल्कुल वैसा ही जैसा कि आपने कहा है कि भूत द्रव्य और चेतना को पृथक कर पाना संभव नहीं हो सकता, कि ये दोनों उसी तरह एक ही वस्तु के दो पहलू हों? जिन्हें अलग किया जाना संभव ही न हो।जाहिर है आपके उक्त वक्तव्य में प्राचीन दर्शन की तात्कालिक जरूरत और शुरूआती मतों और भ्रमों की बानगी प्रस्तुत करने की आकांक्षा है। आपने इस सूत्र को पकड़ा, आभारी हूं।शुक्रिया।

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  3. चंदन कुमार मिश्र
    सितम्बर 12, 2011 @ 11:25:14

    रुचिकर तो है पर पूरा स्पष्ट नहीं हुआ। 'भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का स्वभाव सापेक्ष होता है।' – यह वाक्य जरा उदाहरण के साथ और विस्तार से समझाएँ तो अच्छा लगेगा।

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  4. समय
    सितम्बर 13, 2011 @ 15:15:15

    @ चंदन जी,इस पूरी प्रविष्टि में इसी को समझाने का प्रयास लिया गया है। शायद यह थोड़ा क्लिष्ट है, पर समस्या विषय और इसकी शब्दावली के गूढ़ होने की वज़ह से ज़्यादा होती है। थोड़ा सा गंभीर और असल जीवनीय संदर्भों में इसे देखने का प्रयास शनैः शनैः इसे समझने में आपको अधिक समर्थ बनाता जाएगा।दर्शन में इन दो प्रवर्गों ( categories ) को दर्शन के मूल प्रश्न के संदर्भ में देखा और व्याख्यायित किया जाता है। इस प्रविष्टि के शुरुआत में इन दोनों की प्रतिपक्षता के बारे में पुनः बताया गया है कि किस तरह ये दोनों एक दूसरे के प्रतिपक्ष में साबित होते हैं। ऐसा लगता है कि ये दोनों में निरपेक्ष रूप से एक बिलगाव है और यदि इसे ऐसा ही मानकर फिर इसी के अनुसार चेतना को एक अलग और स्वायत्त रूप से अस्तित्वमान मानकर या फिर इसे भूतद्रव्य से उत्पन्न मानकर इसे सिर्फ़ भौतिक प्रभावों के अंतर्गत ही देखते हुए चेतना या अन्य मानसिक क्रियाकलापों का अध्ययन किया जाएगा तो जाहिरा तौर पर वह हमें सही वस्तुगत वैज्ञानिक निष्कर्षों तक नहीं पहुंचा सकता।यह सही है कि चेतना का स्पष्ट भौतिक आधार होता है, पर एक बार पैदा होने के पश्चात यानि मस्तिष्क में विभिन्न रूपों में परावर्तित और स्मृति का अंग बनने के पश्चात, यह अमूर्त चिंतन का विषय भी बन जाती है। और इसी प्रकार वह विभिन्न विचारों और कल्पनाओं के रूप में, परिवेशीय भौतिक जगत से उत्पन्न होने के बावजूद भी, इस भौतिकता का अतिक्रमण भी करती है। सारा विकास इसी की देन होता है।इसलिए यह कहा गया है कि प्राथमिकता तय करते वक़्त हम इनकी प्रतिपक्षता के स्वरूप पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, और इसके भूतद्रव्य के पक्ष में हल होने के पश्चात, फिर इनकी इस प्रतिपक्षता के आपसी संबंधों, सापेक्षता और इनके अंतर्द्वंदों को समझते हैं और इनकी इस सापेक्षता ( relativity ) के साथ ही मानसिक प्रक्रियाओं को समझने के प्रयास किए जाने चाहिए।इस प्रविष्टि में एक उदाहरण के जरिए यह समझाया गया ही है कि किस तरह विषयी ( object ) और विषय ( subject ) के लिए चेतना या मानसिक क्रियाकलापों का प्रेक्षण, अपनी स्थिति बदलने पर बदल जाता है। एक का मानसिक क्रियाकलाप दूसरे के लिए किस तरह एक भूतद्रव्य या वस्तुगत यथार्थता के रूप में उभरता है।दार्शनिक अवधारणाओं से सामान्यतः अपरिचय, इन्हें शुरुआती तौर पर समझने में दिक्कत तो करता है, पर धीरे-धीरे इनसे परिचय बढ़ते जाने पर इनको आत्मसात् करना आसान हो जाता है। असल बात तो इन्हें समझे ही जाने की आवश्यकता पैदा होने की है।शुक्रिया।

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  5. चंदन कुमार मिश्र
    सितम्बर 13, 2011 @ 19:52:00

    'हम देखते हैं कि भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को तय करते वक्त, वस्तुगत और आत्मगत एक दूसरे के प्रतिपक्ष में स्पष्टतः खड़े होते हैं' – यह तो समझ में आता है लेकिन 'इसी से यह दर्शाया जा सकता है कि चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है।' — यह स्पष्ट नहीं हो रहा समय!'ऐसा लगता है कि ये दोनों में निरपेक्ष रूप से एक बिलगाव है और यदि इसे ऐसा ही मानकर फिर इसी के अनुसार चेतना को एक अलग और स्वायत्त रूप से अस्तित्वमान मानकर या फिर इसे भूतद्रव्य से उत्पन्न मानकर इसे सिर्फ़ भौतिक प्रभावों के अंतर्गत ही देखते हुए चेतना या अन्य मानसिक क्रियाकलापों का अध्ययन किया जाएगा तो जाहिरा तौर पर वह हमें सही वस्तुगत वैज्ञानिक निष्कर्षों तक नहीं पहुंचा सकता।'यह पढ़ते ही संदेह हुआ कि यह कैसे हो सकता है। लेकिन जब स्मृति और अमूर्त चिंतन की बात आई, तब लगा कि कुछ समझ में आया। अन्त में मैं यही समझ सका कि भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता अगर निरपेक्ष हो जाय तो हमें दोनों का अलग और स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकारना होगा और पुन: हम अवैज्ञानिक और भाववादी विचारधारा की ओर पहुँच जाएंगे। लगता है कि 'भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता'–यही शब्द-समूह परेशान कर रहे हैं और बाधक बन रहे हैं। फिर भी समझने की कोशिश जारी है। आपका आभारी हूँ, जो ये सब आवश्यक बातें बता, समझा रहे हैं।

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  6. समय
    सितम्बर 21, 2011 @ 15:13:52

    @ चंदन जी,"हम देखते हैं कि भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को तय करते वक्त, वस्तुगत और आत्मगत एक दूसरे के प्रतिपक्ष में स्पष्टतः खड़े होते हैं' – यह तो समझ में आता है लेकिन 'इसी से यह दर्शाया जा सकता है कि चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है।' — यह स्पष्ट नहीं हो रहा।"यह कहने का मंतव्य लगभग वही है जिसे आपने अपने अंतिम अनुच्छेद में कहा है। इस बात को समझने के लिए कि, ‘चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है', इनकी इस प्रतिपक्षता को उभार कर, कुछ समय के लिए इनकी सापेक्षता को भुला कर ( क्योंकि इनकी सापेक्षता या प्रतिपक्षता चेतना की उत्पत्ति के बाद की चीज़ है ), इनकी प्राथमिकता की समस्या को हल किया जा सकता है।यानि कि ‘भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को तय करते वक़्त’, इनकी प्राथमिकता को तय करते समय, ‘वस्तुगत और आत्मगत एक दूसरे के प्रतिपक्ष में स्पष्टतः खड़े होते हैं', इनकी इसी प्रतिपक्षता के स्वरूप पर समग्र ध्यान केंद्रित किया जाता है चूंकि, 'इसी से यह दर्शाया जा सकता है कि चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है।'यह तय करने के पश्चात, अब चूंकि चेतना भूतद्रव्य के विकास का उत्पाद है अतः आगे के विश्लेषणों में इनके अंतर्संबंधों की सापेक्षता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, नहीं तो हम यथार्थ का सही परावर्तन करने में अक्षम रहेंगे और ग़लतियां करेंगे।एक बात और, पिछले संवाद में हम ज़ल्दबाजी में विषय के लिए subject और विषयी के लिए object अंग्रेजी शब्द लिख गए थे, जबकि सही इनका उल्टा है। यानि विषय ( object ) तथा विषयी ( subject )|शुक्रिया।

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