जीवन का क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों के जटिलीकरण की सैद्धांतिक अवधारणाओं के सार-संक्षेप पर एक नज़र ड़ाली थी। आज हम यहां जीवन के क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति से संबंधित अवधारणाओं से गुजरेंगे।

यहां एक बात कहने की जरूरत महसूस हो रही है।

सैद्धांतिक अवधारणाएं, इनसे अब तक अपरिचित मानवश्रेष्ठों के लिए थोड़ा दुरूह होती हैं, पर यही दुरूहता गंभीर दिलचस्पी रखने वाले मानवश्रेष्ठों के लिए इन्हें समझे जाने की जरूरत और इस हेतु सक्रिय प्रयासों का रास्ता भी प्रशस्त करती है। दुरूहताओं से सप्रयास जूझना, इनके संबंध में मानवश्रेष्ठों की समझ को अंदर से मथता है और प्राप्त संगतियां और निष्कर्ष उसकी समझ का हिस्सा बनते हैं, जिससे कि अंततः उसका व्यवहार निर्देशित होता है।

बिना इस प्रक्रिया के प्राप्त ज्ञान, – जो पहले से प्राप्त अनुकूलित प्रबोधन के साथ अंतर्क्रियाएं तथा अंतर्संबध नहीं पैदा कर पाता, इसका स्वाभाविक विकास नहीं कर पाता – आंतरिक मानसिक जगत के लिए सिर्फ़ सूचनाओं का जंजाल बनता है (जिन्हें स्मृति कई बार, अक्सर भुला भी देती है), वह समझ और व्यवहार का हिस्सा नहीं बन पाता, मनुष्य का अपना एक सार्विक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा नहीं कर पाता।

आखिर यह अकारण नहीं होता कि न्यूटन जैसा महान वैज्ञानिक अपने जीवन के अंत समय में धार्मिकता की ओर उन्मुख हो जाता है, चोटी के वैज्ञानिक भाववादी मानसिकताओं में उलझे रहते हैं, रॉकेटों, चंद्रयानों को नारियल फोड़ कर अंतरिक्ष में भेजा जाता है, बड़े-बड़े डॉक्टर अलौकिक चमत्कारिकता में विश्वास करते पाये जाते हैं, और कई प्रबुद्ध और समझदार से लगते लोग अपने कार्यक्षेत्र में भी और इससे बाहर की चीज़ों के साथ भी अमूमन अपनी सामंती परंपराओं से प्राप्त मानसिकता औए समझ के साथ सोचते और व्यवहार करते नज़र आते हैं।

कभी अवसर उपलब्ध हुआ और समय मिला तो सामाजिक-वैयक्तिक मनोविज्ञान की इन स्वाभाविक परिणितियों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी, फिलहाल आपके मनोजगत में हलचल के लिए इतने ही इशारे पर्याप्त से लग रहे है। आखिर कहा भी तो जाता है कि समझदार को इशारा काफ़ी होता है।

चलिए अपने उसी विषय पर लौटते हैं, और चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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जीवन का क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति

परावर्तन का आगे का विकास जीवन के क्रमविकास से संबद्ध था। जीवन भूतद्रव्य के अस्तित्व तथा उसकी गति का एक विशेष रूप है। इसके बुनियादी भौतिक वाहक हैं प्रोटीन और न्यूक्लीय अम्ल, जो जीवित अंगियों की संतानोत्पत्ति तथा आनुवंशिकता के संचारण और नियंत्रण को सुनिश्चित बनाते हैं। जीवित अंगियों के विशिष्ट लक्षण हैं उपापचयन, वृद्धि, उत्तेज्यता ( क्षोभनशीलता ), स्वपुनरुत्पादन, स्वनियमन और पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता। सरलतम अंगी एककोशिकीय हैं। जीवन का और अधिक परिष्करण लंबी, जटिल, अंतर्विरोधी विकास की प्रक्रिया के जरिए हुआ। इस प्रक्रिया को जैविक क्रमविकास कहते हैं।

क्रमविकास के दौरान जीवित अंगी अधिक जटिल और परिष्कृत बनते गये। चूंकि पर्यावरण तथा जीवन की सारी दशाएं धीरे-धीरे बदलीं, इसलिए अंगियों की वही किस्में जीवित बची रहीं, जो इन परिवर्तनों के लिए सर्वोत्तम ढ़ंग से अनुकूलित थीं। पर्यावरण के प्रति अनुकूलन दो प्रक्रियाओं पर आधारित है: पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होने वाले अनुगुण तथा विशेषताएं ( आनुवंशिकता ) और परिवर्तनशीलता ( उत्परिपर्तन )। विभिन्न कारणों से प्रभावांतर्गत अंगियों की कई विशेषताएं सहसा छलांगनुमा ढ़ंग से परिवर्तित हो जाती हैं। यह परिवर्तन सारी जाति की दृष्टि से सांयोगिक हो सकते हैं। यदि कोई अनेपक्षित परिवर्तन उपयोगी सिद्ध हुआ ( बाह्य जगत के प्रति बेहतर अनुकूलन की क्षमता और आनुवंशिकता के द्वारा संचारण ) तो उस अंगी के वंशज पौधों व जानवरों की अन्य जातियों के साथ अस्तित्व के लिए संघर्ष में अधिक आसानी से जीवित बचे रहे।

जीवित अंगी बाह्य पर्यावरण की क्रिया के ही विषय नहीं हैं, बल्कि स्वयं भी उसको प्रभावित करते हैं। अपने जीवन के क्रियाकलाप के दौरान, पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होते समय वे एक निश्चित क्रिया या निश्चित कार्य करते हैं। यह परावर्तन के सिद्धांत के नज़रिए से विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीवित अंगियों में परावर्तन सिर्फ़ उनकी आंतरिक संरचनाओं में प्रतिकूल परिवर्तनों से ही नहीं, बल्कि उनकी जीवन क्रिया से भी संबद्ध हैं।

जीवन संघर्ष के दौरान अंगी अधिक जटिल तथा परिष्कृत होते गये और इसी प्रक्रिया में एककोशिकीय से बहुकोशिकीय अंगियों में संक्रमण हुआ। बहुकोशिकीय अंगियों की कोशिकाओं के समूह और अंग अलग-अलग कार्य करने के लिए विशेषीकृत हो गये। समय बीतने पर तंत्रिका कोशिका नाम की कोशिकाओं के समूह पैदा होते हैं, जो परावर्तन का कार्य करने के लिए विशेषीकृत होते हैं।

जीवित अंगियों में परावर्तन उत्तेजनशीलता के अनुगुण के रूप में प्रकट होता है, यानि पर्यावरण के असर के प्रति अनुक्रिया करने की अंगी की क्षमता के रूप में। इसमें वह एक निश्चित समयांतराल में अपने को इस ढ़ंग से परिवर्तित कर लेता है कि वह उस प्रभाव के प्रति बेहतर ढ़ंग से अनुकूलित होने और अपने को जीवित तथा सुरक्षित रखने में समर्थ हो जाता है। उत्तेजनशीलता का आधार भौतिक जैव-विद्युतीय प्रक्रियाएं होती हैं।

क्रम-विकास की अगली अवस्था में अधिक विकसित प्राणियों ( मत्स्य, कीट, जलस्थलचारी, स्तनपायी ) में एक जटिल बहुशाखीय तंत्रिकातंत्र बन गया। नये विशेषीकरण के फलस्वरूप कुछ तंत्रिका कोशिकाएं पर्यावरण के केवल प्रकाश के प्रभावों, कुछ केवल ध्वनि प्रभावों और कुछ यांत्रिक प्तभावों का ही प्रत्यक्षण करने लगीं। कोशिकाओं का एक विशेष समूह अन्य के बीच संबंध स्थापित करनेवाला मध्यस्थ बन गया यानि तंत्रिका आवेगों को अन्य अंगों तक संचारित करने, पूर्ववर्ती प्रभावों के बारे में सूचना संग्रह ( स्मरण ) करने तथा पर्यावरण से प्राप्त संकेतों का विश्लेषण तथा उनमें फेरबदल करने के विशेष कार्य करने लगा। उच्चतर जानवरों में इन विशेष तंत्रिका कोशिकाओं से एक विशेष अंग की रचना हुई, जो पर्यावरण के सारे परावर्तनों तथा उसके साथ अंतर्क्रिया के नियंत्रण का कार्य करने लगा। यह अंग मस्तिष्क है।

तंत्रिकातंत्र और ख़ासकर मस्तिष्क की उत्पत्ति के साथ परावर्तन एक नये और अधिक ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। बाह्य जगत के वस्तुगत प्रभावों के प्रति अनुक्रिया के रूप में प्रतिकूल संरचनात्मक परिवर्तन ऐसे कार्य संबंधी परिवर्तनों से संपूरित हो गये, जो अंगी को बनाए या सुरक्षित रखने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने प्राकृतिक वास-स्थल के प्रति तथा उसके साथ अंतर्क्रिया करने के लिए भी बेहतर अनुकूलित थे।
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इस बार इतना ही।
अगली प्रस्तुतियों में, यथार्थता के निष्क्रिय और सक्रिय परावर्तन पर नज़र ड़ालेंगे, और चेतना की उत्पत्ति की ओर आगे बढ़ेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

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16 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. शरद कोकास
    दिसम्बर 14, 2009 @ 14:14:58

    धन्यवाद समय जी । क्रमविकास की विभिन्न अवस्थाओं का परावर्तन के स्तरों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सर्वथा उचित विष्लेषण है । मस्तिष्क़ की उत्पत्ति यह मनुष्य जीवन में उत्क्रांति की भांति है जिसके अभाव में यह पृथ्वि किंचित मात्र भी इस स्वरूप में दिखाई नही देती ।चेतना के स्तर पर सम्वाद करते हुए उसकी उत्पत्ति के समय मस्तिष्क की तत्कालीन अवस्था के विषय मे भी पर्याप्त विमर्श हो सकेगा ऐसी आशा है ।

    प्रतिक्रिया

  2. Arvind Mishra
    दिसम्बर 14, 2009 @ 14:44:39

    आपका संकेत यहाँ अप्रासंगिक है समय -यह कोई डांड मेड़ की लड़ाई नहीं समय -पीयर रिव्यू एक आधुनिक चलन है बौद्धिकों में !और आपके लेखों का पाठक वर्ग उच्च श्रेणी का ही है ! हो सकता है यह मेरी सामन्ती सोच हो मगर मैं तो भाई एक बेहद साधारण सा मानुष हूँ ! पता नहीं कैसे मैं आपका लिखा समझ जाता हूँ मगर बहुत से लोग नहीं समझ सकेगें ! इसे उच्च स्तरीय पाठ्यपुस्तकों के लिए रिकमेंड किया जाना चाहिए !ब्लागजगत में अभी हल्का फुल्का ही रहे तो ही ठीक है ! मैंने प्राणी शास्त्र में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पी एच डी किया था एक कड़क जमाने में तब नयी नयी कुछ अनुवादित किताबों में ऐसी भाषा देखी थी ! ज़माना गुजर गया …मुझे तब बहुत अच्छा लगेगा जब इस आलोचना से आप जरा भी विचलित न होकर शैक्षिक मान्यताओं/मूल्यों की रक्षा करेगें !एक व्यक्ति के रूप में आपकी अच्छी इमेज है वो जो भी हों आप !सादर ,

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  3. स्वप्निल भारतीय
    दिसम्बर 14, 2009 @ 15:19:38

    त्रुटि सुधार: वैसे प्रकाशन पूर्व समीक्षा जिसे हमारे प्रकाशको के वहाँ (क्योकि मै अंग्रेजी प्रकाशन मे था) पीयर रिव्व्यू भी कहा जाता है प्रकाशन के पूर्व होती है न की बाद मे। बाद मे तो सिर्फ समीक्षा होती है।

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  4. दृष्टिकोण
    दिसम्बर 14, 2009 @ 15:28:24

    बंधु,इसमें कोई दो मत नहीं कि आप बेहद महत्वपूर्ण सूचनाएँ उपलब्ध करा रहें हैं परन्तु यदि यह भाषा की जटिलता की वजह से यदि यह संप्रेषणीयता खो देती है तो कोई लाभ नहीं होगा। विषय में रुचि के बावजूद यदि कोई इस ज्ञान के भंडार से वंचित रह जाता है तो यह विज्ञान की बड़ी भारी असफलता होगी। अस्तु कृपा करके जरा आम आदमी की भाषा में अपने मंतव्यों को प्रस्तुत करने का कष्ट करें यह सब कुछ बेहद महत्वपूर्ण हैं।दूसरी बात यदि यह ज्ञान केवल सूचनाओं की तरह परोसा जाए तब भी हम जैसे अकिंचन इससे ज्यादा लाभ नहीं ले पाऐंगे अतः यह चर्चा सुलभ संभव इस तरह से प्रस्तुत हो कि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ ले सकें और सही जगह पर इसको एप्लाई कर अपनी तर्कशक्ति विकसित कर सकें। दृष्टिकोणwww.drishtikon2009@blogspot.com

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  5. L.K.Goswami
    दिसम्बर 14, 2009 @ 15:29:08

    पहला तथ्य वह जो स्वप्निल ने कहा…दूसरा की इसके लिए सम्बंधित विषय का विशेषज्ञ होना जरुरी होता है (कई मामलों में विशेषज्ञों की टीम).मुझे समझ नही आ रहा बात विषय पर न होकर दूसरी चीजों पर क्यों हो रही है ..मान लिया की लेखक की भाषा किलिष्ट है जिसे पढ़ना होना पढ़ेगा, न पढ़ना होगा नही पढ़ेगा ..वैसे भी कई मित्र इन विषयों के लोकप्रियकरण में लगे तो हैं ही उनकी भी निरंतरता सुनिश्चित होगी ऐसे.व्यक्तिगत रूप से अच्छा इन्सान होना या न होना विषय के प्रस्तुतीकरण और विश्लेषण से क्योंकर संबंध रखने लगा ?

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  6. L.K.Goswami
    दिसम्बर 14, 2009 @ 15:47:55

    @दृष्टिकोण जी – ये सूचनाएं नही हैं …और न ही यह कोई न्यूज पोर्टल.

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  7. स्वप्निल भारतीय
    दिसम्बर 14, 2009 @ 15:54:29

    भाषा का सरलीकरण करते करते हमने संस्कृत का वध कर दिया। अग्रेजी हमारी मातृभाषा न होते हुये भी जुबानो पर ऐसी चढ गयी है जैसे बनारसी पान — रंग उतरता ही नही। अब जाहे जितनी भी क्लिष्ट हो हिंदी परायी अंग्रेजी से ज्यादा कठिन तो नही हो सकती लेकिन जिसे देखिये 'प्लीज' का कटोरा लिये बैठा है बरतानी हुकूमत के सामने। अब दो रास्ते है — या तो लोगों‌ की भाषा का स्तर ऊँचा किया जाये या अपनी भाषा के स्तर को गिराया जाये। दूसरा चर्चा यदि यह हो रही है कि किसे प्रधानमंत्री चुना जाये और लोग बहस इस ओर मोड दें कि प्रधानमंत्री कपडे क्या पहने तो बात समझ नही आती। खैर मै तकनीक जगत का पत्रकार आदमी हूँ। आप लोग ही सुलझायें या मर्जी उल्झायें। वैसे डिस्कवरी जैसे बुद्दू बक्सा कार्यक्रम भारत मे इसी लिये नही बन पाये क्योकि उनका सरलीकरण नही हो पाया। वैसे एप्लाइ की जगह "लागू करना" कैसा लगेगा? दूर से तो अच्छा लग रहा है — समय जी आप नजदीक है आप ही कुछ कहें।

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  8. सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi
    दिसम्बर 14, 2009 @ 20:25:42

    समय जी , नमस्‍कार मैंने शायद बहुत पहले इस स्थिति को भांप लिया था। इस बार मानसिक रूप से तैयार था और कुछ कुछ इस विषय में पढ़ भी चुका हूं सो मुझे इस बार भाषा की समस्‍या इतनी बड़ी नहीं लगी जितनी कि अन्‍य पाठक बता रहे हैं, फिर भी संप्रेषण में भाषा ही बाधा बन जाए तो आपको एक बार और सोचना चाहिए। प्रसंग रोचकता की ओर बढ़ रहा है, किसी भी कारण से इसे रोकिएगा मत, चाहे अपनी इसी शैली में लिखें या आगे भाषा को सरलीकृत करें लेकिन जारी रखिएगा। इस लेख के लिए तहेदिल से आभार…

    प्रतिक्रिया

  9. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
    दिसम्बर 15, 2009 @ 07:37:00

    समय जी, सबसे पहले आपकी लेखनी को प्रणाम करना चाहूँगा। जब भी आप लिखते हैं, वह उल्लेखनीय होता है। इसलिए आपके इस लेख के लिए आपको सर्वप्रथम बधाई देना चाहूँगा।इसके बाद मैं भाषा के मुददे पर और जो यह टिप्पणियों पर बहस चल रही है, उसपर भी कुछ कहना चाहूंगा। अभी पिछले दिनों मैंने 'उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान' की फेलोशिप के तहत "हिन्दी का बदलता स्वरूप एवं पटकथा लेखन" विषय पर शोध कार्य किया है। हालाँकि यह कार्य पूरी तरह से इस बहस से सम्बंधित नहीं है, फिर भी हिन्दी की बात है, इसलिए कहने की गुस्ताखी कर रहा हूँ।मेरा अपना मानना है और जैसा कि मैंने उक्त शोध के दौरान भी देखा है समय के साथ भाषा अपने आप बदलती रही है। हालँकि इस बदलाव पर लोग चीखते चिल्लाते हैं, आंसू बहाते हैं, पर बदलाव किसी के रोके नहीं रूकता। इसे हम संस्कृत से लेकर आज की एस एम एस वाली हिन्दी तक में देख सकते हैं।चाहे साहित्यजगत हो चाहे फिल्म जगत और चाहे विज्ञान जगत हो आज सरल लेखन की ज्यादा आवश्यकता है। सीधी सी बात है कि उसकी पहुंच ज्यादा लोगों तक होती हैं। लिखने को महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'बाणभटट की आत्मकथा' जैसा श्रेष्ठ उपन्यास लिखा है, पर वह प्रेमचंद के गोदान के आगे पिछड़ जाता है, कारण वही भाषा। 'बाणभटट की आत्मकथा' आज खोजे से नहीं मिलती और गोदान को प्रकाशकों के बीच होड़ लगी हुई है। अगर आज कोई व्यक्ति यह कहे कि संस्कृत सर्वश्रेष्ठ भाषा है, मैं तो इसी में लिखूगा, तो इसका तो कोई जवाब नहीं दिया जा सकता है, लेकिन यदि हम इसलिए लिख रहे हैं कि उसे अधिक से अधिक से लोग पढ़े, लोगों का ज्ञानवर्द्धन हो, तो आज के समय को देखते हुए सरल भाषा में लिखना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

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  10. स्वप्निल भारतीय
    दिसम्बर 15, 2009 @ 15:11:47

    भाषा को लेकर महारथियों मे भ्रम है कि भाषा अपने आप स्वरुप बदलती रहती है। असत्य है। भाषा आन्तरिक व बाह्य दोनो कारको की वजह से रूप परिवर्तित करती है। और कोई भी परिवर्तन एक दिशा मे होता है। मौलिक तथ्य है की सभी प्रकार के परिवर्तन विकास नही होते, जबकि विकास के लिये परिवर्तन पहली शर्त है। कारक की उपस्थिति का अर्थ है कि वह प्राकृतिक नही वरन उददेश्यत्मक परिवर्तन है। यदि पुन: नये उद्देश्य लेकर कारक के साथ छेड छाड की जाये तो स्थिति मे परिवर्तन हो सकता है। अरब देशों से आये आक्रान्ताओं के वजह से फारसी तथा इस्लाम धर्म भारत आया। फारसी तथा उर्दू का विस्तार हुआ, नयी संस्कृति आयी। फिर युरोपीय साम्राज्य वादी आये। भारत के अधिकतर हिस्सों पर अंग्रेजो का शासन छा गया। अंग्रेजी भाषा आयी, इसाई धर्म आया।इस समय अमरीकी पूंजीवाद का दौर है, दीपावली मे मिठाई की जगह इतालवी पिज्जा और शरबत की जगह अमरीका कोक आ गयी है। भाषा अंग्रेजी। तो भाषा कोई स्वत: ही नही संस्कृत से अंग्रेजी हो गयी — उसे किया गया। लेकिन यह कोई ऐसा नुक्सान नही है जिसे सुधारा ना जा सके। तो वैज्ञानिक चेतना वाले लोग तुरंत ही समझ जायेंगे कि परिवर्तन की दिशा बदलने भर की देरी है। आवश्यक्ता है आत्म बल और दूरद्रष्टि की। इस्रायल ने हिब्रू को पुन: जीवित कर लिया। यदि हम दलालों से बचे रहे तो शायद पुन: हिंदी व संस्कृत की वापसी हो सकेगी। [यहाँ दिये गये विचार मेरे व्यक्तिगत विचार है, उनका मुझसे जुडी संस्थाओं से कोई संबंध नही है।]

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  11. Ram Bansal, the Theosoph
    दिसम्बर 17, 2009 @ 23:13:49

    Hindi men tippani karane ka sadhan nahin samajh paa rahaa hoon, isliye roman ko apana raha hoon. aasha hai kshama karenge.baat bhasha ki chali hai to spashta kar doon ki gambhir vicharon ki prastuti ke liye lekhak ka apane mool bhasha pravah men hona atyadhik aavashyak hai. isliye jo likha ja raha hai, sheshtha hai, achchha hai, pathniya hai, aur sabse adhik grahniya hai. danyavaad.

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  12. SAMWAAD.COM
    दिसम्बर 19, 2009 @ 07:28:08

    "यदि हम दलालों से बचे रहे तो शायद पुन: हिंदी व संस्कृत की वापसी हो सकेगी।"शायद वह आत्मबल आपके ही पास हो? क्योंकि इतने भाषाविद, पंडित, संस्थाएं और सरकारें तो प्रयास करके हार गयीं।पता नहीं किस युग में जी रहे हैं आप? परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जो सरल से सरलतम की ओर गति करता है। इजराइल का अपवाद हर जगह लागू नहीं किया जा सकता, भारत जैसे देश में तो कदापि नहीं। बावजूद इसके आप दिवास्वप्न देख रहे हैं, तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है।

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  13. drshyam
    मई 25, 2010 @ 06:56:41

    –बहुत अच्छा सम्बाद चल रहा है.समय जी ने बहुत अच्छा विषय प्रवर्तन किया है.—सम्बाद जी परिवर्तन प्रक्रिति कानियम है पर सरल से सरल्तम की ओर नहीं अपितु उच्च से उच्चतर( कठिन) की ओर अन्यथा सामान्य एक कोशीय जीव से मानव की ओर प्रगति नहीं होती.–यह विषय कोई हल्का-फ़ुल्का या सिर्फ़ फ़ुल्के तक सिमटे रहने वाले लोगों के लिये नहीं, उन्हें यह पढने की आवश्यकता भी नहीं, अपितु विद्वानों के लिये है,विषय के अनुकूल ही भाषा होती है,यह वैसा ही बात है कि एम ए की पुस्तक में कक्षा ५ की हिन्दी लिखने की सिफ़ारिस हो.—आत्मबल सबके पास होता है बस साहस, उचित ग्यान व दिशा निर्देश की आवश्यकता होती है.

    प्रतिक्रिया

  14. Dr. shyam gupta
    मई 29, 2010 @ 07:16:42

    वहारिक ज़िन्दगी और वास्तविक ज़िन्दगी क्या अलग अलग होती हैं, यहीं से प्रारम्भ होता है भ्रम-ज़िन्दगीन सदैव वास्तविक ही होती है ।— पिछले ग्यान को छोड्कर, भुलाकर नहीं उस पर नींव बनाकर चला जाता है, इसी को विकास कहते हैं अन्यथा दिशाहीनता बनी रहेगी जो आज की स्थिति है( और हर युग में बनी है, पुनर्स्थापना से पहले ); —- कोई भी प्राच्य या नवीन , ग्यान या बस्तु छोडने या अपनाने से प्रथम उसकी वैधता, उपयोगिता , अन्तर्निहित मानवीयता शक्ति का अच्छी तरह परीक्षण करना चाहिये न कि प्राच्य को निक्रिष्ट मानकर छोडाजाने योग्य या नवीन से निक्रिष्ट ही होगा मानकर चलना चाहिये।—चक्रीय गति का अर्थ स्प्रिन्ग वाली गति नहीं अपितु जो पुनः उसी स्थान पर लौट कर आये उसे कहते है, सभ्यता ( मानवीय गुणों , आदर्शों को सभ्यता कहते हैं–भौतिक उन्नति को नहीं) स्रिष्टि -लय–श्रिष्टि की भान्ति चक्रीय होती है। क्योन्कि समय व दिक , स्वयम चक्रीय क्रम है–वर्तमान–भूत—भविष्य चक्रीय भाव द्वारा एक दूसरे के अन्योन्याश्रित है, एक दूसरे में लय व स्थित हैं। यथा वर्तमान -भूत का भविष्य व भविश्य का भूत होता है-इसी त्तरह समझना चाहिये तीनों को ।——अतीत में यदि सबकुछ सर्वश्रेष्ठ रह भी चुका हो ( सर्वश्रेष्ठ-तो एक ईश्वर ही है उसी की ओर तो यह सब प्रयाण है, अत: तुलनात्मक श्रेष्ठ शब्द ही उचित होगा ) तो भी मानव ग्यान , आचरण, व्यवहार कौशल को और उच्चतम बनाने की ओर कदम बढाया जाता है क्योंकि मानव ग्यान के बस की यह बात नहीं कि वह सर्वश्रेष्ठ क्या है यह जान पाये, वह तो सिर्फ़ सम्मुख उपस्थित में श्रेष्ठ्ता की तुलना कर सकता है, अतः प्राच्य ग्यान को अच्छी तरह जानकर नवीन ग्यान को तुलनात्मक कसौटी पर तौलकर आगे बढना होता है। यही विकास है.

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  15. चंदन कुमार मिश्र
    अगस्त 03, 2011 @ 13:40:05

    यहाँ तो समझ कम ही आया। शब्द का अभ्यास और अध्ययन करना होगा। अगर आदमी अपने को आज से दो सौ साल पहले की तुलना में अधिक विकसित मानता है तो वह 500 शब्दों क्यों सब कुछ सीखना चाहता है।इस आलेख पर बात भाषा को लेकर अधिक हो गयी है बजाय विषय के। इस पर कुछ कहने की इच्छा है। मैंने जब यह खोजना शुरु किया कि एक आम आदमी जो पढ़ा लिखा है वह कितने शब्द औसतन इस्तेमाल करता तब अनुमान लगाया कि 5000। इन पाँच हजार शब्दों में अंग्रेजी के शब्दों की संख्या 2500 से भी अधिक हो गयी है। इसे चिन्ता का विषय कैसे नहीं माना जाय? और शब्द तो क्लिष्ट होंगे ही जब उच्च शिक्षा की बात करेंगे। क्या अंग्रेजी के उच्च शिक्षा में नये शब्द नहीं सीखते हैं लोग? वहाँ जब लोगों को शब्द सीखने पड़ते हैं तब कठिन नहीं लगता। और हाँ, बाणभट्ट की आत्मकथा महावीर प्रसाद द्विवेदी ने नहीं हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा था। भाषा चलती है चलाई नहीं जाती है, यह बात आम भाषा के लिए सच हो सकती है। उच्च शिक्षा की भाषा चलाई जाती है। आम भाषा पर भी सरकार का नियंत्रण रहता है। जैसे मोबाइल आया तो सबसे पहले अगर भारत सरकार इसे नाम बदलकर हिन्दी शब्द रख देती और बाजारों में बिकवाती या प्रचार करवाती तो इसे मोबाइल नहीं कहा जाता। शब्द हमेशा उच्च वर्ग के लोग चलाते हैं और जनता उसे ही बोलती है, ऐसा मेरा मत है।

    प्रतिक्रिया

  16. चंदन कुमार मिश्र
    सितम्बर 11, 2011 @ 14:37:03

    'न्यूटन जैसा महान वैज्ञानिक अपने जीवन के अंत समय में धार्मिकता की ओर उन्मुख हो जाता है, चोटी के वैज्ञानिक भाववादी मानसिकताओं में उलझे रहते हैं, रॉकेटों, चंद्रयानों को नारियल फोड़ कर अंतरिक्ष में भेजा जाता है, बड़े-बड़े डॉक्टर अलौकिक चमत्कारिकता में विश्वास करते पाये जाते हैं, और कई प्रबुद्ध और समझदार से लगते लोग अपने कार्यक्षेत्र में भी और इससे बाहर की चीज़ों के साथ भी अमूमन अपनी सामंती परंपराओं से प्राप्त मानसिकता औए समझ के साथ सोचते और व्यवहार करते नज़र आते हैं।'—– इस पर जरूर जानना चाहूंगा। आखिर ऐसा किस मानसिक प्रक्रिया के चलते हो जाता है?फिर से पढ़ने पर समझा आया सब कुछ, पहले से बेहतर आया। अन्तिम के एक पहले जिसे अंग्रेजी में सेकेंड लास्ट कहेंगे, वाला अनुच्छेद तो लाजवाब लगा और समझ में अच्छे से आया।

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