पदार्थ का मूलभूत गुण – परावर्तन

हे मानवश्रेष्ठों,
समय फिर हाज़िर है।
चेतना की उत्पत्ति पर चल रही श्रृंखला पर फिर लौटते हैं, और इस बार पदार्थ के मूलभूत गुण और उसके सिद्धांत को समझने की कोशिश करते हैं।

आज की चर्चा का यही विषय है। समय यहां अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
०००००००००००००००००००००

मानव-मन या चेतना (Consciousness) की उत्पत्ति उन प्रश्नों में से है, जिन्होंने प्रकृति के नियमों का अध्ययन करने वालों को सबसे अधिक उलझन में ड़ाला है। १८ वीं शताब्दी में दार्शनिकों ने इस प्रश्न पर पुरजोर बहस की थी कि क्या भूतद्रव्य (Matter) के बिना चेतना का अस्तित्व संभव है और अगर नहीं है, तो वह आयी कहां से?

भौतिकवादी वैज्ञानिकों का मत है कि मन या चेतना की उत्पत्ति पदार्थ के विकास की दीर्घ प्रक्रिया के फलस्वरूप संपन्न हुई। पदार्थ की प्रकृति की जांच करते हुए उन्होंने उसकी गति के विभिन्न रूपों पर ध्यान केन्द्रित किया, क्योंकि गति ही पदार्थ के अस्तित्व का रूप है। पूर्णतः गतिशून्य और परिवर्तन रहित पदार्थ नाम की कोई चीज़ नहीं है। ब्रह्मांड़ में सारा पदार्थ, सारी जीव और जड़ प्रकृति सतत गति, परिवर्तन और विकास की अवस्था में है।

प्रत्ययवादियों (Idealistic) के उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए फ़्रांसीसी भौतिकवादी देनी दिदेरो ने अनुमान लगाया कि भूतद्रव्य के अपने आधार में ही एक विशेष अनुगुण है, जो मूलतः संवेदनों से मिलता जुलता है। इसी से संवेदन की क्षमता तथा बाद में चिंतन का जन्म हुआ। इस अनुमान के समर्थन में उन्होंने अंड़े और चूज़े का उदाहरण दिया कि अंड़े में संवेदन और विश्व के प्रत्यक्षण की क्षमता नहीं होती, जबकि उससे उत्पन्न होनेवाले चूज़े में होती है। फलतः उन्होंने तर्कणा की कि संवेदन की क्षमता अजैव भूतद्रव्य से उत्पन्न हुई।

चूंकि १८ वीं शताब्दी के विज्ञान को हमारे युग के विज्ञान के सापेक्ष जीवन और चेतना की उत्पत्ति के बारे में बहुत कम जानकारी थी इसलिए दिदेरो चेतना और भूतद्रव्य के संबंध के बारे में एक पूर्ण, प्रमाणित दार्शनिक सिद्धांत की रचना नहीं कर पाए।

बहुत बाद में जब मानवजाति का यह वस्तुगत ज्ञान और विकसित होता गया तो एक ऐसे ही सिद्धांत का विकास हुआ जिसे परावर्तन का सिद्धांत कहते हैं।

इस सिद्धांत के अनुसार, अपने जड़, अजैव रूपों से लेकर, पदार्थ के उद्‍विकास के सर्वोच्च तथा जटिलतम उत्पाद – मानव मस्तिष्क तक, सारे पदार्थ का एक सामान्य गुण है परावर्तन। परावर्तन (Reflection, a reflex action, an action in return) भूतद्रव्य (Matter) का एक सार्विक, मूलभूत, अविभाज्य (Integral) तथा वस्तुगत अनुगुण है। यह हर भौतिक वस्तु का अपने साथ अंतर्क्रियाशील अन्य भौतिक वस्तुओं के प्रभाव के प्रति अनुक्रिया करने का एक विशेष गुण है। यानि कि यह भौतिक वस्तुओं द्वारा बाह्य प्रभावों की प्रतिक्रिया है।

परावर्तन के रूप, भूतद्रव्य के रूपों पर निर्भर होते हैं, यह अपने को बाह्य प्रभावों के उत्तर में, इन प्रभावों की प्रकृति के अनुसार क्रिया करने में व्यक्त करता है। जड़ प्रकृति में गति, पिंड़ों अथवा द्रव्यों की यांत्रिक, भौतिक अथवा रासायनिक अन्योन्यक्रिया के रूप ले सकती है। भौतिक विश्व के दीर्घकालिक क्रमविकास तथा पदार्थ की गति के रूपों की बढ़ती जटिलता के दौरान जैव पदार्थ का आविर्भाव गति के रूपों में गुणात्मक परिवर्तन ले आता है। जीवधारियों में परावर्तन के जैव रूप पाये जाते हैं। जैव पदार्थ के उदविकास के दौरान, परावर्तन का यह अनुगुण अंततः मानव चेतना तथा चिंतन में विकसित हो गया। अतः यह कहा जा सकता है कि चेतना परावर्तन का उच्चतम रूप है

विश्व के भौतिक स्वभाव तथा उसके वस्तुगत द्वंदात्मक विकास के दृष्टिकोण और मत, परावर्तन के इस सिद्धांत के साथ घनिष्टता और अविभाज्य रूप से जुड़ा है। प्रत्ययवादी और अधिभूतवादी इस संयोजन को समझने में अक्षम हैं और इसी कारण से वे चेतना की उत्पत्ति के प्रश्न का ऐसा सही उत्तर नहीं दे सकते, जो विज्ञान से मेल खाता हो और प्रकृति और समाज की वस्तुगत समझ विकसित करने में सक्षम हो।

०००००००००००००००००००००००

आज इतना ही।
अगली बार अजैव और जैव जगत में परावर्तन के रूपों पर एक नज़र ड़ालेंगे, और उन्हें थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

Advertisements

7 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    नवम्बर 05, 2009 @ 17:35:39

    सुंदर! संक्षेप में और आसानी से समझने योग्य।

    प्रतिक्रिया

  2. गिरिजेश राव
    नवम्बर 08, 2009 @ 15:39:49

    देखिए मैं दर्शन का विद्यार्थी नहीं हूँ। इसलिए crude साधारणीकरण से समझना चाह रहा हूँ। एक पत्थर के टुकड़े पर दूसरा गिर पड़े और दोनों छ्टक जाँय – क्या इसे बाह्य प्रभावों की प्रतिक्रिया मानी जाय? फिलहाल इस प्रश्न को मुल्तवी रखते हैं कि दूसरा गिरेगा कैसे? अपने आप तो नहीं न?मुझे पता है कि दृष्टांतों द्वारा समझाने से मुश्किलें पेश आती हैं। अब देखिए आप को यानि समय को नदी के प्रवाह द्वारा समझाने की कोशिश दार्शनिक स्तर पर फेल हुई लेकिन साहित्यिक स्तर पर रूढ़ हो गई।लेकिन समझने के लिए कोई उदाहरण वगैरह तो होना चाहिए न ।

    प्रतिक्रिया

  3. Swapnil
    नवम्बर 08, 2009 @ 23:02:43

    चेतना है क्या? क्या भेद है चेतना और आत्मबोध मे? चेतना की यह हमारी परिभाषा है, तो हम यह कह सकते है कि मानव द्वारा अवलोकित हो सकते वाली एक प्रक्रिया। चेतना का स्वरूप भी अलग अलग होता है — पेडो मे भी चेतना होती है, शायद मानव द्वारा अवलोकित चेतना से नितांत भिन्न। कृत्तिम बुद्धिमत्ता वाली मशीनो मे भी चेतना विकसित हो रही है — मानवीय चेतना से भिन्न। तो जिस चेतना की हम बात कर रहे हैं अभी तो उस चेतना को ही नही समझा जा सका है — उसका स्रोत खोजना अभी कठीन होगा। वैसे बिना पदार्थ के चेतना के असित्त्व का मूल्य क्या?

    प्रतिक्रिया

  4. Arvind Mishra
    नवम्बर 10, 2009 @ 14:52:13

    चेतना और पदार्थ का अन्योनाश्रित अंतर्संबंध है -पर इसे व्याख्यायित कर पाना कई बार बेहद मुश्किल है ! आपके दार्शनिक विवेचन काबिले गौर होते है!

    प्रतिक्रिया

  5. शरद कोकास
    नवम्बर 16, 2009 @ 18:38:21

    समय जी .. मै पढ़ रहा हूँ ।

    प्रतिक्रिया

  6. चंदन कुमार मिश्र
    सितम्बर 11, 2011 @ 11:24:27

    'प्रत्ययवादियों (Idealistic) के उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए फ़्रांसीसी भौतिकवादी देनी दिदेरो ने अनुमान लगाया ' -इसमें प्रत्ययवादी का सवाल कहाँ है?

    प्रतिक्रिया

  7. समय
    सितम्बर 11, 2011 @ 12:55:59

    @चंदन कुमार मिश्रआपने गंभीरता से पढ़ा तो यह रह गई कमी सामने आई। शुक्रिया।उस वाक्य को इस तरह पढ़े:"प्रत्ययवादियों (Idealistic) के इस प्रश्न कि यदि भूतद्रव्य अजैव है तो चेतना कहां से आई का उत्तर देते हुए फ़्रांसीसी भौतिकवादी देनी दिदेरो ने अनुमान लगाया कि भूतद्रव्य के अपने आधार में ही एक विशेष अनुगुण है, जो मूलतः संवेदनों से मिलता जुलता है।"दरअसल, इस प्रश्न को मूल प्रश्न में ही समाहित सा देख कर लिखने से बचा गया होगा।

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: