टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक – ३

हे मानवश्रेष्ठों,
समय यहां श्रृंखला के बीच में कुछ टिप्पणियों को देने की गुस्ताख़ी कर रहा है।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। उम्मीद है आपके दिमाग़ को कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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विजयादशमी पर विशेष – रामसेतु… प्रविष्टि पर ‘बुराभला’ पर टिप्पणी:

आपकी या श्रृद्धालुओं की आस्था पर जाहिरा तौर पर सवाल खडे़ नहीं किये जा सकते, आखिर यह व्यक्तिगत मामला है और सभी स्वतंत्र हैं कि वे ज्ञान और समझ के किस स्तर पर रहना पसंद करते हैं, उन्हें कहां सुभीता लगता है।

परंतु यहां आप इसे तार्किक औए वैज्ञानिक रूप के साथ रख रहे हैं और आस्था के लिए तार्किक ज़मीन तैयार कर रहे हैं, इसलिए यह नाचीज़ यह टिप्पणी करने की हिमाकत कर रहा है, आशा है मुआफ़ करेंगे और अन्यथा नहीं लेंगे।

अगर आप वाकई वैज्ञानिक तरीकों से इतिहास और मानवजाति के क्रमविकास को समझना चाहते हैं तो आपकों वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिखे इतिहास और ऐतिहासिक समझ से गुजरना पड़ेगा। ना कि तथ्यों और निष्कर्षों का मनचाहा मानसिक जाल बुनकर अपने को तुष्ट करने का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। और निश्चिंत रहें, उसके बाद भी हमारे पास गर्व करने के लिए काफ़ी सामग्री होगी साथ ही ढ़ेर सारे सबक भी होंगे जिनसे भविष्य को संवारने का उचित रास्ता निकाल सकने की असीम संभावनाएं भी मौजूद रह सकें।

और वैज्ञानिक तरीके से संपुष्ट इतिहास की समझ कहती है, कि हमारे महान ग्रंथ वेदों का समय ही ईसा पूर्व १५००, यानि कि आज से ३५०० वर्ष प्राचीन हैं, और इनका संकलन और लिपिबद्धिकरण तो और बहुत बाद की चीज़ हैं।

हड़प्पा सभ्यता के नगरों के निर्माण का समय २७०० ईसा पूर्व, यानि आज से लगभग ४७०० वर्ष पूर्व का निश्चित हुआ है। जाहिर है सिंधु घाटी की यह सभ्यता वेदों की आर्य सभ्यता से भी प्राचीन है। इसकी खोज ने, जो कि आज से लगभग ८०-९० वर्ष पूर्व ही हुई है, आर्यों के यहीं के होने या बाहर से आने वाले विवाद को भी खत्म कर दिया, और यह निश्चित हो गया कि आर्य ईरान की तरफ़ से आए थे और उनसे पहले यहां सापेक्षतः उनसे बहुत विकसित सभ्यता मौजूद थी।

हमारे इतिहास को जब वैदिक नज़रिए से देखा जाता है, तो काल के उस हिस्से का अध्ययन पूर्ववैदिक और उत्तरवैदिक काल के रूप में किया जाता है। वेदों के समय की सभ्यता का स्तर वेदों से ही मिल सकता है, जिससे साफ़ संकेत मिलते हैं आर्य उस वक्त खानाबदोश अवस्थाओं के पशुपालक अवस्थाओं से गुजर रहे थे। उनके वेद कालीन देवता भी अलग थे, जिनमें इन्द्र सबसे प्रमुख थे, और आपकी जानकारी के लिए यह भी काफ़ी महत्वपूर्ण होगा कि वेदकालीन देवताओं में उत्तरवैदिक देवतागणों जैसे कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के लिए कोई जिक्र नहीं है। हमारे इन महान देवी-देवताओं का बखान हम बाद के महान ग्रंथों उपनिषदों और पुराणों में पाते हैं जो कि निश्चित ही वेदों के बाद के हैं।

अब चूंकि रामायण में इन भी देवी-देवताओं का चरित्र-चित्रण काफ़ी विस्तार से हुआ है, तो जाहिरा तौर पर यह निष्कर्ष निकलना लाजिमी है कि वाल्मिकी रामायण का समय वेदों और पुराणों के बाद का ही है। यह दोहराना अब महत्व नहीं रखता कि वेदों का समय आज से ३५०० वर्ष पूर्व का है, अतः रामायण का काल भी इनके बाद ही ठहराया जा सकता है।

जाहिर है कि इसके समय को ७००० वर्ष पूर्व ले जाना आस्था का विषय तो हो सकता है, परंतु तर्क और वैज्ञानिकता का नहीं।

अतएव आस्था है तो उसे आस्था ही रहने दिया जाए। आस्था को तर्कों और वैज्ञानिकता के दृष्टिकोणों से तौलेंगे तो हो सकता है कि आस्था पर चोट पहुंचने की परिस्थितियां पैदा हों। जो कि जाहिर है हमारा और आपका उद्देश्य या इच्छित कतई नहीं है।

राम हमारे और हमारे जनमानस की आस्था के नायक हैं, उन्हें आस्था की, श्रृद्धा की विषयवस्तु ही रहने दें, उन्हें तर्क और वैज्ञानिकता से तौलना इस आस्था औए श्रृद्धा के खिलाफ़ ही जाएगा।…..

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क्या पुनर्जन्म संभंव है? एक बेबाक….प्रविष्टि पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

लोकप्रिय मामलों में ऐसा होता ही है। आखिर अधिकतर लोग अपने सामान्य सूचनापरक ज्ञान के ही आधार पर ही, उपलब्ध हो पाए ज्ञान के आधार पर ही जीवन के भवसागर में उतरे हुए हैं।

बाकी सब तो है जैसा ही है।
आपकी लिखी एक बात ने चौंकाया। ‘आत्मा की खोज अभी जारी है।’
क्या खूब!

समस्या यहीं से तो शुरू होती है, और वहीं आप संशय छोड़ देते हैं।

अगर आत्मा की खोज अभी जारी है, यानि कि आत्मा के बारे में अभी कुछ खास नहीं कहा जा सकता। आत्मा की उपस्थिति के विचार का ही विस्तार हैं ये सभी मामले, जो आपस में गुंथे हुए हैं।

आत्मा का विचार सबसे प्राचीन है, आदिमकालीन। इसी से हर भौतिक वस्तुओं में आत्मा, देवत्वरोपण, ईश्वर, परमआत्मा आदि-आदि की संकल्पनाएं पैदा हुईं। पुनर्जन्म की अवधारणा का अविष्कार तो इनके सापेक्ष काफ़ी आधुनिक है। हमारे यहां वेदों के समय तक यह पैदा नहीं हुई थी।

अगर आप ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ इसे देखेंगे तब पता पड़ेगा कि इस अवधारणा की उत्पत्ति, लगभग राज्यों और उनके शोषण की उत्पत्ति के साथ-साथ हुई।

यदि आत्मा है, तो ईश्वर है, चेतना से पदार्थ की उत्पत्ति है, भूत-प्रेत हैं, जादू-चमत्कार हैं, पुनर्जन्म है, सारी भूल-भुलैयाएं हैं।

इसलिए आत्मा के प्रश्न से जूझना सबसे प्राथमिक है। आप आत्मा के अस्तित्व के सवाल को स्थगित रखकर या अभी संदेह में रखकर, बाकी की बातों के लिए तर्कों के जरिए पुरजोर लड़ाई नहीं लड़ सकते।

विज्ञान की उत्पत्ति के समय ही सर्वप्रथम उसकी उर्जा इन्हीं सब के अस्तित्व को टटोलने में ज्यादा खर्च हुई थी, इसे ऐसे भी कह सकते है पदार्थ और चेतना के संबंधों को समझने के इन प्रयासों से ही विज्ञान की उत्पत्ति हुई थी।

असल विज्ञान जितनी उर्जा खर्च कर सकता था, कर ली गई, और अब उसके पास इन फ़ालतू की चीज़ों के लिए समय नहीं है। अब केवल सूडोसाईंस की कुछ धाराएं ही इस सब पर अभी भी साधनों और उर्जा का अपव्यय करने में लगी हुई हैं, और यह यथास्थिति बनाए रखने की, आम जनमानस को उलझाए रखने की कवायदें वर्तमान व्यवस्था के हितों के अनुकूल हैं, अतः वह इन्हें प्रश्रय और प्रचार उपलब्ध कराता रहता है।

सारी स्थिति विज्ञान और अद्यतन दर्शन के सामने बिल्कुल साफ़ है, यह बात अलग है कि वह आपकी कितनी पहुंच में हैं।…..
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स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियां और कुछ विचार…प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

ग्रामीण इलाकों और शहरों में भी ग्रामीण परिवेशगत मानसिकताओं में इन परिघटनाओं का व्यापक असर है।

आपने इसे यहां उठाकर सही दृष्टि और सरोकारों के साथ विश्लेषित करने का समुचित प्रयास किया है। आप इसमें दो चीज़े औए जोड़ सकती हैं।

एक तो इन परिघटनाओं के पीछे के कुछ काम संबंधी आधार जो कि अक्सर अनछुए रह जाते हैं, या इस तरीके से इन्हें देखना और विश्लेषित करना काम संबंधी वर्जनाओं और अनैतिकताओं के घटाघोपों के चलते जानबूझकर छोड़ दिया जाता है।

दूसरा, जिसका कि आपने सिर्फ़ इशारा किया है पर उसे पुरजोर तरीके से उठाया जाना चाहिए ही, अक्सर ऐसे मामलों का पूरी चेतना और होशोहवास के साथ सृजित किया जाना। यह पूरी तरह से जानबूझकर किया जाता है और इसके पीछे के कारणों को आपने यहां रखा ही है।

कई मामलों में साहित्यिक सी भाषा में यह कहा जा सकता है कि इस तरह की परिघटनाएं पुरूष सत्ता के प्रति उन्हीं के बनाए हथियारों के साथ, हाशिए की स्त्रियों का यह एक विद्रोह है जो इस तरह उन्हें एक छद्म ही सही पर अपनी इच्छित परिस्थितियों के निर्माण का एक अल्पकालिक और कभी-कभी तो दीर्घकालिक भी, अवसर देता है।

पराशक्तियों के मामले में भी सही इशारे किए हैं आपने। जो दावा करता है, संदिग्ध तो वह ऐसे ही हो जाता है, क्योंकि उसे दावा करने की जरूरत पड़ी। यानि कि वह यह दावा करके इसके जरिए कुछ पाना चाहता है।

बहुत कम बार ही ये रोगी-सोगी होते हैं। बाकि जिन्हें दिलचस्पी है वे ऐसे अधिकतर मामलों के पीछे की झूंठ-सिद्धी की कई कहानियां ढूंढ़ सकते हैं।…..
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इसी प्रविष्टि पर आदरणीय वत्स जी की टिप्पणी पर एक प्रतिटिप्पणी:

आधुनिक ज्ञान पुरातन का ही विस्तार होता है, क्रमिक विकास की प्रक्रिया में होता है। नये अनुभव और प्रमाण, पुरानी कई चीज़ों को गलत साबित करते हैं और कई पुरानी चीज़ों की कमियों को रेखांकित कर उसे और सटीक बनाते हैं।

उपवास और यज्ञादि की भी ऐसी ही चीरफ़ाड़ की गई और परंपराओं से जुड़े इन क्रियाकलापों में कुछ तार्किकता ढ़ूंढ़ने की कोशिश की गई कि आखिर इनमें क्या कुछ ऐसा है जिससे मानवजाति फ़ायदा उठा सकती है। यह वत्स जी का इछ्छित है।

समझदारी का तकाज़ा वत्स जी के इच्छित को तो शामिल करता ही है, साथ ही इसे और आगे लेजाकर जो व्यर्थ शाबित हुआ है उससे मुक्ति पाने की मांग भी रखता है।

समस्या यही पैदा होती है।

स्त्रियां किसी विशेष दिन व्रत-उपवास रखती हैं, अगर वे अपने आपको थोड़ा पढे-लिखों में शुमार भी करवाना चाहती हैं तो पूछने पर वे ऐसे ही वत्स जी की तरह जवाब देंगी कि देखो इस बहाने थोड़ा ड़ाईटिंग बगैरा हो जाती है जी।

अगर उनसे कहा जाए कि यह तो ठीक है, चलिए ऐसा कीजिए आप उस विशेष दिन को छोड़ दीजिए, और किसी दिन यह विज्ञान-सिद्ध फ़ायदे उठा लीजिए।

तब असलियत सामने आती है कि इनका यह विज्ञान-सिद्ध रूप नहीं वरन पारंपरिक धार्मिक विश्वास असल मूल में हैं। और इसीलिए यह होता है कि विज्ञान-सिद्धि जाती है भाड़ में और ढ़ोंग बन कर रह जाती है।

अक्सर लोग व्रत-उपवास में सामान्य दिनों से अधिक कैलौरी का सेवन करते हुए देखे जाते हैं, उन्होंने अपने मतलब के हिसाब से कई तोड़ निकाल लिए हैं। असल मंतव्य धार्मिक छद्म के जरिए मिलने वाली उसी मनोवैज्ञानिक, मानसिक तसल्ली का ही है जिसका जिक्र लवली कुमारी कर रही हैं।

किसी अंश की वैज्ञानिकता से, किसी भी पूरे पाखंड़ को जायज नहीं ठहराया जा सकता। वत्स जी तो शायद ही सहमत हों, पर और मानवश्रेष्ठ इस पर विचार कर सकते हैं।

वत्स जी की विधि का ही प्रयोग करके यह भी तो कहा जा सकता है कि कब तक वे सदियों पूर्व की मानसिकता और परिस्थितियों के अनुसार कही और लिखी बातों की भूलभुलैया मे भटके रहकर उसे ही परम ज्ञान की घुट्टी के रूप में परोसते रहेंगे और मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान से नज़रें चुराते रहेंगे।…..
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तो चलें समय के उस फ़लक पर…प्रविष्टि पर ‘ज्योतिष दर्शन’ पर टिप्पणी:

…जब बात प्राकॄतिक परिधटनाओं के संदर्भ में कही जा रही हो जैसा कि आईंस्टीन और बकौल निशांत मिश्र, स्टीफन हॉकिंग के निहितार्थ हैं, बात एकदम वाज़िब है।

विज्ञान के अनुसार प्राकृतिक परिघटनाओं की नियमसंगतता को सिद्धांत के रूप में तभी निरूपित माना जा सकता है, जब यह नियमसंगीतियों के जरिए वस्तुगतता के संदर्भ में निश्चित भविष्यवाणी करने में समर्थ सिद्ध होता है।

समस्या यह है कि व्यवस्थागत असुरक्षाओं के चलते, अपने व्यक्तिगत भविष्य को जानने की उत्कंठा में मनुष्य इन वैज्ञानिक प्रास्थापनाओं में प्रयुक्त हुए मिलते-जुलते अभीष्ट शब्दों को देखकर, उनका सही निहितार्थ समझे बगैर इनका मनमाफ़िक, अपने मंतव्यों के निहितार्थ उपयोग करने लगता है और समाज में विद्यमान भ्रमों की संपुष्टि के जरिए अपने अस्तित्व की प्रतिष्ठा और दोहन की जुंबिशों में जुट जाता है।

वैज्ञानिक ज्ञान के जरिए अब तक समझ आई प्राकृतिक परिघटनाओं और दर्शन की ऐतिहासिक भौतिकवादी अवधारणाओं के जरिए सामाजिक परिघटनाओं की भाविष्यवाणियां की जा सकती हैं, और की भी जाती हैं।

प्राकृतिक परिघटनाओं के सापेक्ष सामाजिक परिघटनाओं के मामले में सटीक भविष्यवाणियां थोड़ी मुश्किल होती हैं, क्योंकि यहां वस्तुगत यथार्थता के साथ, एक और तत्व जुड़ जाता है वह है चेतनागत यथार्थता। इनकी अन्योन्यक्रियाएं निरंतर नये-नये प्रभाव और निर्भरता पैदा करती रहती हैं, और वस्तुगत यथार्थ को निरंतर परिवर्तित करती रहती हैं।

तो प्राकृतिक परिघटनाओं के मामले में नियमसंगतता को समझने के बाद उनकी नियमों के अंतर्गत तयशुदा नियति से ऐसे भ्रामिक वक्तव्य निकाले जा सकते हैं जिनसे सत्य का आभास भी होता है और जो भ्रमों को और बढा़कर काल्पनिक कपोल कल्पनाओं के नये नये द्वार खोल सकता हो, जैसे यह कथन या निष्कर्ष जो कि यहां निकाला गया है कि सब कुछ पूर्व नियत है और हर चीज़ का एक निश्चित भविष्य है।

फिर यह संभावना पैदा हो सकती है कि इसे साधारणतयः मनुष्य अपने जीवन और समाज से जोड़कर देखने लगता है, और ऐसी ही चिंतन और निष्कर्षों की और उद्यत होता है जिसे कि आपने बाद में विवेचित किया है।

और आपकी समझ भी इस घलमपेल को समझ पा रही है, इसीलिए आपके सामने यह अनुत्तरित प्रश्नों और कल्पनाओं को छोड जाती है।…..
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वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और…प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

आपने सही कहा है कि व्यक्ति अपनी सामाजिक अन्योन्यक्रियाओं के जरिए अपने एक मानसिक जगत का निर्माण करता है। अपेक्षाओं की पूर्ति की भौतिक संभावनाएं, व्यवहारिक रूप में, इन मानसिक इच्छाओं की अभिव्यक्ति को संचालित और नियंत्रित करती रहती हैं।

असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल, अपेक्षित आदर्श परिस्थितियों और क्रूर वास्तविकताओं के मध्य एक द्वंद बनाए रखता है। इनसे विचलन और अपरिपक्वता, मानसिक अस्थिरता पैदा करती है और ऊल-जलूल व्यवहार में अपनी अभिव्यक्ति पाती है।

समस्या यह भी है कि आजकल मानसिक चिकित्सा के नाम पर भी व्यापारिक और सतही मानसिकता हावी है। इस ओर गंभीर प्रयासों का अभाव है। मनोवैज्ञान और शारीरिक चिकित्सा को आपस में गड्ड-मड्ड कर दिया गया है और मानसिक रोगी के मनोवैज्ञानिक अध्ययन और कौंसिलिंग का अभाव नज़र आता है। रोगी और मनोचिकित्सक दोनों के पास समय और मनोव्यवहार की गहराई टटोलने की समझ का अभाव है, और परिणति तात्कालिक ईलाज़ यानि मष्तिष्क को सुन्न कर मानसिक क्रिया व्यवहार को स्थगित करने की प्रवृति के रूप में सामने आ रही है।

ये दवाइयां उन्हें इसकी लत ड़ालती है और रोगी, संबंधियों और मनोचिकित्सक, सभी को अपने मुफ़ीद लगती हैं। असली मनोवैज्ञानिक सवाल पृष्ठ्भूमि में ही रह जाते हैं।…..
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नारीयां क्यो बनाती हैं यौन संबंध? एक….प्रविष्टि पर ‘साईब्लॉग’ पर टिप्पणी:

आपने एक रोचक विषय उठाया है, कम से कम पुरूषों के लिए तो है ही।

पुरूषप्रधान समाज की मानसिकता इसे ऐसे ही रूप में लेने को अभिशप्त है, जैसा कि विवेक और जाकिर भाई की टिप्पणियों से जाहिर होता है। भले ही यह आपका मंतव्य रहा हो या नहीं।

इसलिए समझदारी का तकाज़ा कहता है कि प्रस्तुति और विश्लेषण का तरीका ऐसा होना चाहिए कि यह सिर्फ़ प्रचलित मानसिकताओं की सनसनीखेज़ तुष्टि का जरिया भर बन कर ना रह जाएं बल्कि एक सहिष्णु यथार्थ समझ की सही दिशा की राह प्रशस्त करता हो।

शरद कोकास एक गंभीर इशारा जरूर कर रहे हैं पर वहां भी यौन संबंधों का हथियारगत इस्तेमाल अवश्य ही मिलेगा।पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के अधिकार सीमित हैं। स्त्री पुरूष के लिए संपत्ति है और इसके अनुरूप ही भोग्या सामग्री। उसके लिए यौन संबंध यौन तुष्टि के साथ-साथ अपनी सत्ता के प्रस्फुटिकरण और प्रदर्शन का साधन भी हैं। इसीलिए वह यौन संबंधों के लिए अवसरवादी है और अपनी सत्ता और स्त्री की निर्भरता के चलते अवसरों की संभावनाएं भी खूब रखता है।

इस सारे जंजाल में स्त्री व्यक्तित्व की आधिकारिक उपस्थिति कहीं भी अभिव्यक्त नहीं होती। इसीलिए वह वह बराबरी के, प्रेम के, भावनात्मक संबंधों के अवसरों के लिए हमेशा प्रतीक्षारत रहती है।

स्त्री के व्यक्तित्व का यही खालीपन, लंपट पुरूषों के लिए और अधिक अवसर उपलब्ध कराता है। और फिर धोखा, छल, मोहभंग जैसी अवस्थाओं की परिणति अस्तित्व में आती हैं।

स्त्री केवल यौन तुष्टि के उपकरण के रूप में अपनी पुरजोर उपस्थिति दर्ज़ कर पाती है। पुरूष जब कभी भावुकता में भी होता है तो इसकी परिणति यौन संबंध तक खींच ले ही जाता है।

कुलमिलाकर लाबलुब्बेआब यह कि सामान्यतया स्त्री के लिए पुरूष की यह यौन जरूरत और उसकी पूर्ति के लिए स्त्री की भौतिक उपस्थिति की आवश्यकता उसके लिए एक हथियार की तरह उभरने की संभावना पैदा करती है जिसका कि इस्तेमाल तात्कालिक रूप से अपना मनोइच्छित प्राप्त करने में किया जा सकता है।

इसी की अभिव्यक्ति, जैसा कि इस आलेख में जिक्र है, भौतिक वस्तुओ, उसके क्रियाकलापों में सहायता और भावनात्मक संतुष्टि को यौन संबंधों के जरिए प्राप्त करने के रूप में होती है।

जहां बराबरी के से संबंधों की उपस्थिति होती है, वहां फिर भी इनके पृष्ठभूमि में होने की संभावनाएं हो सकती हैं।

मनुष्य की यौन संबंधों की सहज और प्राकृतिक जरूरत इसी व्यवस्थागत रूप के चलते विकृतियों के लिए अभिशप्त है।…..
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आशा है कि कई विषयों पर चिंतन हेतु आपके दिमाग़ को निश्चित ही कुछ ख़ुराक तो मिली ही होगी।
आप चाहे तो किसी पर भी संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है।

शुक्रिया।

समय
समय के साये में – आपके दिमाग़ से रूबरू आपकी ज़िंदगी का आईना

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15 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Arvind Mishra
    अक्टूबर 22, 2009 @ 14:53:20

    पुनर्पाठ की सुविधा हेतु आभार !

    प्रतिक्रिया

  2. Swapnil
    अक्टूबर 22, 2009 @ 15:03:22

    समय से परिचय करवाने के लिये उस मित्र का आभार। समय जी, शायद मै गलत हू पर मेरा अनुभव, जो कि अधिक नही है, कहता है इस तरह की चर्चाये लोगो की विचारधारा नही बदल सकती। वे जो है, वही रहेंगे। पर इस तरह के प्रयास आवश्यक हैं‌ जिससे यह अहसास बना रहे कि कुछ भी गलत विज्ञान की थाली मे परोस कर नही बांटा जा सकता।

    प्रतिक्रिया

  3. गिरिजेश राव
    अक्टूबर 22, 2009 @ 16:41:18

    वैदिक सभ्यता, सरस्वती और आधुनिक जेनेटिक मैपिंग पर अपने को अद्यतन कर लें। हमलावर अंग्रेजों और वैसी ही यूरोपीय श्रेष्ठता जैसी मानसिकता द्वारा स्थापित बहुत सी स्थापनाएँ ध्वस्त हो चुकी हैं।आप को लिंक देने की गुस्ताखी नहीं कर सकता। आप अद्भुत और निष्ठावान अध्येता हैं, स्वयं ढूढ़ लें। नेट पर अफरात सामग्री उपलब्ध है और देने वाले सभी दक्षिणपंथी या प्रतिक्रियावादी भी नही हैं।

    प्रतिक्रिया

  4. लवली कुमारी / Lovely kumari
    अक्टूबर 22, 2009 @ 17:43:23

    @स्वप्निल इतने गुस्से में न आइये मित्र शंति शांति 🙂

    प्रतिक्रिया

  5. Swapnil
    अक्टूबर 22, 2009 @ 17:45:54

    @ लवली: ओम् शाति: शांति: शाति::-)

    प्रतिक्रिया

  6. समय
    अक्टूबर 23, 2009 @ 14:43:34

    @ स्वप्निलभाई स्वप्निल,विचारधाराओं के पीछे मनुष्य की अपनी पूरी उम्र का अनुकूलन होता है। व्यवस्था के हितानुकूल विचारधाराएं सहज रूप से ही जीवन का अंग बन जाती है, परंपराएं इनके साथ घुलमिलकर प्रभाव जमाती हैं, साथ ही जिजीविषा की व्यवस्थागत समझौतापरस्ती इन्हें और पुख़्ता करती जाती है।अब दो मिनट की जुंबिश में किसी की इतनी लंबी अनुकूलनता को बदल ड़ालने का इच्छित स्वप्नजीविता ही है। वैज्ञानिक नहीं वरन् प्रत्ययवादी (Idealistic)दृष्टिकोण जैसा ही है।वास्तविक भौतिक परिस्थितियां मनुष्य के विचार और विचारधाराओं को पैदा करती हैं। अतएव इनमें सुधार या बदलाव भी उसकी इन्हीं वास्तविक भौतिक परिस्थितियों में बदलाव के ऊपर ही निर्भर करता है। वैचारिक विमर्शों से चित्त में होने वाली हलचल और तत्कालीन निष्कर्ष भी मन की गहराइयों में पैठी वास्तविक अनुभवों की कठोर चट्टानों से टकराकर ही पुख़्ता हो पाते हैं।जैसे अभी जो समय ने ऊपर लिखा है, उसे पढ़कर आप ऐसी ही प्रक्रिया से गुजरेंगे। अगर बात मान्यताओं के बिल्कुल ख़िलाफ़ लगेगी तो मानसिक प्रतिक्रिया नकारात्मक, तर्क और अनुकूल अनुभवों की भूल-भुलैया में भटकेगी और इस मानसिक आक्रमण के प्रतिरोध के रास्ते तलाशेगी।थोड़ा ठीक-ठीक, तार्किक और वाज़िब सी लगेगी तब भी मनुष्य का मानस इसे अपनाने को सहज ही तैयार नहीं होगा, इसके अनुरूप ज़मीन बनने में समय लगता है।और यदि बात बिल्कुल ही विरोधी हो तो आप कल्पना कर सकते हैं कि मनुष्य कैसी-कैसी मानसिक अवस्थाओं और संघर्षों से गुजरने की अवस्थाओं में आ सकता है। और यदि उसका मानसिक धरातल ज्यादा परिपक्व नहीं हुआ साथ ही उसके पास समुचित तर्क या ज्ञान नहीं हुआ तो फिर आप उसकी भावी प्रतिक्रिया का भी अंदाज़ा लगा सकते हैं।ऐसे में आपको परिणामों की ज़्यादा फ़िक्र और जुंबिशों की दृढ़्ता के प्रति ज़्यादा संवेदनशील नहीं होना चाहिए। यह एक लंबी प्रक्रिया है, सिर्फ़ इसी में लगे रहें, और अपने आपको साधते रहें। यह भी काफ़ी महत्वपूर्ण है।शुक्रिया।

    प्रतिक्रिया

  7. समय
    अक्टूबर 23, 2009 @ 14:47:57

    @ गिरिजेश रावभाई गिरिजेश जी,आपकी आपत्ति वाले हिस्से का खुलासा करें।अपनी समझ को अद्यतन करने का महती कार्य तो हमारे सामने है ही।आपके खुलासे से समय की जुंबिश सटीक हो पाएगी।वरना अंतर्जाल का महा-माया-जाल तो उलझाकर ही रख देगा। यहां सही और सटीक को प्राप्त कर पाना अपने आप में एक दुरूह और लंबा कार्य है।आपकी कविताओं से गुजरना हुआ था। प्रभावित करती हैं। आपका कवि अधिक सजग है।शुक्रिया।

    प्रतिक्रिया

  8. Swapnil
    अक्टूबर 23, 2009 @ 15:48:29

    समय आपकी बात से पूर्णत: सहमत हूँ। जिस क्षेत्र मे कार्य कर रहा हूँ वहाँ तो चुनौतिया और भी दुरूह हैं‌ — माइक्रोसाफ़्ट के क्रूर जाल से लोगो को निकालना। यहाँ तो कार्पोरेट भी है और सुविधा भी। लक्ष्य बहुत दूर है, पर एक एक ईट जोडी जा रही है। समय लगेगा। ब्लागिग का संसार थोडा अलग है, लेकिन जैसे मैने पहले कहा, सत्य की उपस्तिथि आवश्यक है… एक् दीपक भले ही रात को दिन ना बना दे लेकिन रात्रि मे भी रोशनी का वजूद तो देता ही है — सबेरा तो हो कर ही रहेगा।

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  9. अर्कजेश
    अक्टूबर 24, 2009 @ 18:38:40

    ब्लॉगिंग में इस तरह का गंभीर ग्यान एक अलग शुरुआत है ।आर्यों और सिन्धु सभ्यता विषयक आपकी मान्यताओं से मेरी सहमति है।बहुत पहुंचे हुए लोग लोग आत्मा और पुनर्जन्म का समर्थन कर गये हैं । कम से कम भारत के सभी धर्म पुनर्जम को स्वीकाए करते हैं ।लेकिन जब अपने को पता नहीं चलता तो हवा में लट्ठ क्यों भांजे ।धर्मों की सारी नैतिकता ही स्वर्ग-नर्क या पुनर्जन्म पर टिकी हुई है ।

    प्रतिक्रिया

  10. गिरिजेश राव
    अक्टूबर 25, 2009 @ 03:50:38

    @ आपका कवि अधिक सजग है।मतलब कि दुसरका पर लापरवाही से ब्लॉगि‍ग करते हैं। ये कैसी तोहमत लगा रहे हैं? हम तो समझते थे कि आलसी आलस के कारण अधिक सजग रहता है।__________________________________आपत्ति नहीं, ये मान्यताएँ ही गलत साबित हो चुकी हैं:- भारतीय सन्दर्भ में आर्य जैसी किसी विशिष्ट मानव प्रजाति का होना या बाहर से भारत आना।- आर्य और द्रविड़ जैसे विभेद- सिन्धु सभ्यता के पहले यहाँ किसी उन्नत सभ्यता का न होना। बहुत पहले नेट पर ही एक शोधपरक पी डी एफ डॉकुमेंट मिला था तमाम लिंकों के साथ। एक अलग ही दुनिया उद्घाटित थी। पोर्टेबल हार्ड डिस्क में सेव किया था। खराब हो गई। डाटा रिकवर करने पर भी वह फाइल खुल नहीं पाई। आप को कोई लिंक बता नहीं पाऊँगा, यही दु:ख है लेकिन लब्बो लुआब वही था जो उपर लिखा है। मुझे उम्मीद है कि आप ढूढ़ निकालेंगे। …. न भी पाए तो क्या हुआ, एक अलग दृष्टि पर सोचा कि आप को बता दूँ।

    प्रतिक्रिया

  11. लवली कुमारी / Lovely kumari
    अक्टूबर 25, 2009 @ 08:13:27

    गिरिजेश जी कहना क्या चाह रहें हैं, मैं समझ नही पा रही ..न ही उनकी टिप्पणी से आपकी (समय ) टिप्पणी के मर्म को रिलेट कर पा रही हूँ …अगर आप समझ गए हों तब मुझे कृपया मेल करके समझा दें समय ..नहीं तो आलसी भाई से अनुरोध है, जरा स्पस्ट लिखे वे कहना क्या चाह रहे हैं और उसका समय की आस्था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली टिप्पणी से क्या सम्बन्ध है.कोई तो मुझ अल्पज्ञानी की मदद करे.

    प्रतिक्रिया

  12. समय
    अक्टूबर 26, 2009 @ 16:47:55

    गिरिजेश जी,इतिहास के इस मामले में, आपकी मानसिक उलझन को थोड़ा-बहुत महसूस कर पा रहा हूं।दरअसल इतिहास के लेखन और व्याख्याओं की कई धाराओं की समांतर उपस्थिति, अध्येता पाठक की चेतना से कई तरीको से टकराती है।एक ओर ब्रिटिश प्रशासकों और विद्वानों का आधिकारिक लेखन है, जिनके योगदान की महत्तवपूर्णता को स्वीकार करते हुए भी, ब्रिटिश साम्राज्य की हितानुकूलता और पूर्वाधारों की ठोस कमी के कारण पैदा हुई संकीर्णता को आसानी से देखा जा सकता है। इन्हीं का अनुसरण करते हुए कुछ भारतीय लोगों ने भी इसी तरह सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य से कटे हुए राजनैतिक इतिहास की गहराइयों में खूब ड़ुबकी लगाई।भारतीय इतिहास लेखन की एक सशक्त प्रवृति सांप्रदायिक परंपरा के साथ विकसित हुई। इस प्रवृति के तहत इतिहास की अपने-अपने हितानुकूल सांप्रदायिक व्याख्याएं की गई और खासकर बारहवीं सदी के बाद के इतिहास को तो हिंदू-मुस्लिम संघंर्षों की कहानी में तब्दील कर दिया गया। अपने-अपने नायकों को महामंडि़त किया और विरोधियों पर प्रहार किये गये।इसी के साथ-साथ एक अंध-राष्ट्रवादी प्रवृत्ति भी रही जिसका कि मूल उद्देश्य भारत को विश्व की आर्य सभ्यता के केन्द्र बिंदु के रूप प्रस्तुत करना रहा है। भारत को आर्यों का मूल उद्‍गम और भारतीय सभ्यता को प्राचीनतम ठहराने का उपक्रम बखूबी किया गया।यहां इतिहास को द्वंदात्मक विधियों और वस्तुगत इतिहास दृष्टियों के साथ देखने का कार्य बहुत बाद में शुरू हुआ। इस धारा में पुराने इतिहास लेखन की आलोचना के साथ-साथ उसकी यथार्थवादी व्याख्याओं के कई संधान हुए हैं। इनमें रजनी पाम दत्त, दामोदर धर्मानंद कोसांबी, आर.एस.शर्मा, देवीप्रसाद चट्टोपध्याय, मो.हबीब, इरफ़ान हबीब आदि-आदि कई मूर्धन्य इतिहासकार शामिल हैं। समय को इनकी व्याख्याएं और दृष्टिकोण अधिक तार्किक और वस्तुगत लगता है।अब होता यह है कि इतिहास के सामान्य अध्येता पाठक की पहुंच जिस तरह के लेखन तक हो पाती है, उसकी वैसी ही प्राथमिक मान्यताएं और धारणाएं आकार लेने लगती हैं। चूंकि यह क्षेत्र सामान्यतयः आम मनुष्य के लिए नया रहता है, साथ ही उसके पास परिवेशगत और परंपरागत प्राप्त एक सामान्य दृष्टिकोण इनके आधार में पहले से ही रहता है, अतः वह इनसे गहराई से प्रभावित होता है और इन्हें ही वस्तुगत सत्य समझने लगता है।हमको अपनी मान्यताएं उपरोक्त सभी तरह के लेखन और व्याख्याओं के अध्ययन के पश्चात ही बनानी चाहिएं। अतीत का वस्तुगत विष्लेषण, वर्तमान के साथ उसकी संबद्धता, और इसके जरिए प्राप्त नियमसंगतियों के सही और यथार्थ आधार पर ही एक मानवोचित भविष्य की नींव रखी जा सकती है।समय यही प्रयास कर रहा है, और चूंकि आप भी एक गंभीर अध्येता हैं, आपसे भी ऐसे ही गंभीर और विस्तृत अध्ययन की आशा रखता है।यहां समग्रता में इतिहास के विस्तार में जाना संभव नहीं है। फिर भी अद्यानूतन पूर्वाधारों और अध्ययन विधियों के साथ प्रमाणों के वस्तुगत विश्लेषण से साबित कर दी गई कुछ मान्यताएं ही समय ने यहां प्रस्तुत करने की हिमाकत की थी। आप चाहें तो इनके आधार भी यहां प्रस्तुत किए जा सकते हैं, परंतु आप द्वारा संदर्भित सूचनाओं की प्राप्ति से पहले यह समीचीन नहीं होगा।नयी खोजें और प्राप्त जानकारी के नवीन विश्लेषण ऐतिहासिक लेखन को और समृद्ध करते हैं और मानवजाति की समझ और ज्ञान को और आगे बढ़ाते हैं इसलिए अपनी ऊपर कही गई बात का अनुसरण करते हुए समय भी अंतर्जाल पर आप द्वारा दी गई सूचनाओ को ढूंढ़ कर उनसे गुजरने की मंशा रखता है, ताकि उनकी उपादेयता पर तुलनात्मक चिंतन किया जा सके।आपको पता चले तो बताएं, और आप भी उपरोक्त नामों द्वारा लिखी गई इतिहास की पुस्तकों को खंगालें। सार्विक दृष्टिकोण के विकास के लिए अच्छा रहता है।संवाद के लिए शुक्रिया।समय

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  13. चंदन कुमार मिश्र
    अगस्त 02, 2011 @ 19:38:50

    आदरणीय समय,बहुत कुछ देखा, सुना, जाना इस बार। कुछ कहने की इच्छा है।शुरु करते हैं राम सेतु से। यह सेतु अनावश्यक विषय है। धर्मग्रंथों के अनुसार या बाल्मीकि रामायण के अनुसार भी यह पुल सही नहीं ठहर सकता। उसमें इसकी लम्बाई 30 नहीं हजारों किमी बताई गई है। यह व्यर्थ का तमाशा कई साइटों और ब्लागों पर दिखा। कुछ लोग विज्ञान का आड़ लेकर अपनी बात को जबरदस्ती साबित करना चाहते हैं।दूसरी बात संचिका के कई लिंक नहीं खुले।तीसरी बात ज्योतिष की। वह एक अटकलबाजी है और इसके प्रसिद्ध होने का मात्र एक कारण है। जब भविष्यवाणी सही होती है तब दस लोग इसे विज्ञापन करने के कारण जानते हैं लेकिन गलत होने पर कोई नहीं कहता और एक भी नहीं जानता कि गलत थी और इसी कारण अधिक प्रसार है इसका। भविष्य जानने की कल्पना भी सुखद और रोमांचक है। जैसे पुनर्जन्म की कल्पना कई बार सुखद लगती है लेकिन काश ये सब होता! अफ़सोस कि ये सब बस अज्ञानता और आदमी की कमजोरी के प्रतीक हैं।एक बात कहूंगा शब्दों के बारे में। आपके लेखों को लगातार पढ़ने के क्रम में कई जगह शब्दों को लेकर कुछ कहा गया है। मेरा निवेदन होगा कि आप अपने इस्तेमाल किए जाने वालों शब्दों का एक कोश उपलब्ध करा दें तो बेहतर हो क्योंकि मनोविज्ञान के शब्द सामान्य शब्दकोश से वह अर्थ देने में अधिक समर्थ नहीं हैं। इसलिए या तो आप पीडीएफ़ में उपलब्ध करा दें या लिंक दे दें जहाँ इनके सही और आपके अभिप्राय स्पष्ट करने वाले अर्थ समझे जा सकें।आइंस्टाइन की बात जब ज्योतिषी करेगा तब गड़बड़ तो होगी ही। अब भौतिकी के उच्च सिद्धान्तों का भी बकवास अर्थ लगा लिया जाना वैसे ही है जैसे कुरुक्षेत्र में लाल जमीन देखकर कहा जाता है कि यहाँ युद्ध हुआ था और रक्त के कारण लाल जमीन है। तब जहाँ काली जमीन है वहाँ क्या हुआ है? या पीली जमीन है वहाँ क्या हुआ है? आइंस्टाइन सिद्धान्तों का प्रतिपादक है और उससे गहरा अर्थ अलौकिकता में विश्वास करने वाले लोग लगा लेते हैं। उसने कहीं इसे मानव के भविष्य से, जैसा कि ज्योतिष करने का बहाना करता है, जुड़ा हुआ नहीं कहा था। हाँ टाइम मशीन जैसी बातें स्टीफ़न हॉकिंग के समय का संक्षिप्त इतिहास में आई हैं। पढ़ने को मिला था वह ग्रंथ। उसे पढ़कर शायद आप यकीन न करें, मुझे बुखार आ गया था। रात को दिमाग में या सपने में बस तारे-ग्रह घूमते थे।इसलिए बिना सिद्धान्तों को जाने उनका अनुचित और अतार्किक इस्तेमाल न किया जाय।अच्छा तो यहीं से इतिहास की बात कही थी आपने!

    प्रतिक्रिया

  14. चंदन कुमार मिश्र
    अगस्त 02, 2011 @ 19:40:29

    साईं ब्लाग वाले लेख में कुछ खास नहीं लगा और साफ कहें तो विषय ही पसन्द नहीं आया।

    प्रतिक्रिया

  15. Trackback: गर्व करने वाली मानसिकता « समय के साये में

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