भाषा और इसकी सरलता के असली मंतव्य

हे मानवश्रेष्ठों,

आज फिर श्रृंखला को तोड़ते हैं।
पिछली चर्चा पर मानवश्रेष्ठ सिद्धार्थ जोशी की कृपापूर्ण टिप्पणी में भाषा और सरलता संबंधी कई महत्वपूर्ण बातें कही गई थीं। उनकी बातों से लगभग सहमत होते हुए भी समय को लगा कि इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए अपने मंतव्य भी स्पष्ट करने चाहिए। जोशी जी को धन्यवाद कि उनके इस संवाद की वज़ह से समय को यह अवसर प्राप्त हुआ।

उनकी टिप्पणी पिछली पोस्ट पर देखी जा सकती है, समय उन्हीं से संवाद रूपी चर्चा को यहां आगे बढा रहा है। आप भी इससे गुजर कर कई महत्वपूर्ण इशारे पा सकते हैं, और चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं।
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सिद्धार्थ जी,
आप समय के नियमित पाठक हैं, साथी हैं। यह समय के लिए निश्चित ही सुकून की बात है।

आपने यहां भाषा के संदर्भ में एकदम सही बात उठाई है। भाषा सही कहा गया है कि सीखी जाती है। बच्चों को सिखाते समय उनके स्तर का ध्यान रखा जाता है। इसीलिए भाषा का संधान एक निरंतर चलती रहने वाली प्रक्रिया है। आपने सही प्रश्न उठाया कि हम बुद्धि वाले लोग भी थोड़ी सी क्लिष्ट भाषा को क्यों नहीं समझ पाते?

उत्तर भी आपने उचित ही दिया है कि दोष भाषा का नहीं बल्कि उसको सुन-पढ़ और समझने की कोशिश कर रहे व्यक्ति की उस भाषा विशेष संबंधी वोकैब्यलैरी यानि शब्दभंडा़र की कमी का है। उसे उस भाषा संबंधी अध्ययन के लिए अपने शब्दभंड़ार का निश्चित ही विकास करना चाहिए। इससे उसकी उस भाषा पर पकड़ और संप्रेषणीयता में निश्चित ही वृद्धि होगी।

यदि यह बात आपने अपने लिए और थोड़ा सा परिपक्व पढ़े-लिखे पाठकों के संदर्भ में उठाई है, तो यह बिल्कुल किया ही जाना चाहिए। आपको और हम बुद्धि वाले लोगों को अपने शब्दभंड़ार में बढ़ोतरी करनी ही चाहिए, ताकि संप्रेषण सटीक रहे। आखिर ज़िंदगी भर तो एक बच्चे को पानी या जल की जगह मम-मम नहीं बोलने दिया जा सकता ना? आपने लगभग ऐसी ही बात कही है।

आमजन से संवाद निश्चित ही इस भाषा में नहीं किया जा सकता। जाहिर ही है कि वहां अपनी बात कहने के लिए हमें आमजन के शब्दभंड़ार और समझ, उनकी अभिव्यंजनाओं और भाषाई मुहावरों को पकड़ना पड़ेगा। तभी संवाद स्थापित हो सकता है, और एक बार संवाद स्थापित हो जाने के बाद फिर उनकी चेतना के स्तर के परिष्कार की, भाषाई समृद्धि की और इसके जरिए उनके समझ के स्तर के परिष्कार की कोशिशें शुरू हो सकती हैं। आखिर किसी भी व्यक्ति की समझ और ज्ञान का स्तर उसके द्वारा प्रयोग में ली जा रही भाषा और शब्दभंड़ार के स्तर से ही तय होता है।

यानि भाषा की सरलता शुरूआत के लिए, संवाद के लिए, जुड़ाव के लिए होनी चाहिए। समय जब आमजन के साथ होता है तो हल्की-फुल्की और गंभीर चर्चाएं भी होती हैं, और वहां यह ध्यान रखने की आवश्यकता भी नहीं होती क्योंकि वही भाषा इस्तेमाल होती है।

हम यहां जाहिरा तौर पर आमजन से संवाद स्थापित नहीं कर रहे हैं। अगर आपको यह गलतफ़हमी है तो उसे समझना और दूर कर लेना चाहिए। आमजन तक तो रोटी, कपड़ा,पानी और बिजली ही नहीं पहुंच पा रही, उसकी नेट और फिर आपके-हमारे ब्लॉगों तक पहुंच हो पाना अभी किसी सपने की ही तरह है। हम उच्च मध्यमवर्गीयों के लिए अपने सुविधासंपन्न कोठरों की निश्चिंतता में कई शब्दों और भाषाई प्रयोगों के मतलब भी बदल गए हैं।

अगर आप कंप्यूटर और नेट तक पहुंच रखने वाले, तथाकथित पढ़े-लिखे और दुनिया को समझने वाले गंभीर विषयों से अभी तक बहुत दूर रहने वाले, ब्लॉग के आम मध्यमवर्गीय पाठकों और ब्लॉगरों के संदर्भ में यह बात कहना चाह रहे हैं, तो मुआफ़ कीजिएगा वह विश्लेषण ज़्यादा सटीक नहीं है।

आमजन में सिर्फ़ पैठ बनाकर अपनी दुकान चलाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों, आम भाषाई मुहावरों में आमजन के बाज़ार में घुसपैठ कर मुनाफ़ा कमाने की आकांक्षाएं रखने वाली बाज़ारू शक्तियों से, सही सरोकार रखने वाले हम बुद्धि वाले लोगो के क्रियाकलापों और क्रियाविधियों में कहीं तो अंतर रखना ही होगा ना। क्या हमारा उद्देश्य केवल अपना और अपने विषय के प्रचार के जरिए लोकप्रियता पाना और फिर उसके जरिए श्रेष्ठता बोध की तुष्टी पाना और इस लोकप्रियता को इस हेतु और सिक्कों की खनक के रूप में भुनाना भर है?

जिन्हें आमजन से फ़ायदा उठाना और अपना मतलब साधना होता है वे इन लोकप्रिय रूपों का प्रयोग करते हैं, उनके स्तर तक पहुंचते हैं, उनके मनमाफ़िक रहने वाली बाते करते हैं फिर अपना मुनाफ़ा समेटकर अपने वातानुकूलित महलों में अंग्रेजी चर्चाओं में मशगूल हो जाते हैं। उनका उद्देश्य यही होता है, और आमजन की चेतना के परिष्कार-फरिष्कार, या उनकी समस्याओं के निबटारे या किसी भी तरह के व्यवस्थागत और सामाजिक बदलाव की कोई भी मंशा उनके ज़ेहन में नहीं होती। इसे आप गांधीगिरी, फ़िल्मों, हिंग्लिश के प्रयोग, और हिंदी के दिखावटी प्रयोग के संदर्भों में रखकर देख सकते हैं।

जिन्हें आमजन की चेतना के परिष्कार के जरिए सामाजिक और व्यवस्थागत बदलावों के हेतु आमजन को लामबंद करने का महती कार्य जरूरी लगता है, वे आमजन तक उसके स्तर तक पहुंचते हैं, उसकी तकलीफ़ों में शामिल होते हैं और उनकी समझ का स्तर ऊपर उठाकर, अपने रास्ते ख़ुद तलाशने की योग्यता पैदा करने का उद्देश्य सामने रखते हैं।

इसीलिए यह आवश्यक है कि हम भी अपनी भाषा को थोड़ा सहज करें जहां हो सकता है, और थोड़ा अवसर भी रखें ताकि ब्लॉग जगत का आम पाठक भी अपने शब्दभंड़ार को समृद्ध कर, अपनी समझ का परिष्कार कर सके। जिसे इसकी भौतिक और मानसिक जरूरत महसूस होती है, वह ज्ञान को समझने के अपने रास्ते खु़द तलाशता है। जिनका उद्देश्य सिर्फ़ मनोरंजन, समय गुजारना, अपनी जैसी-तैसी अभिव्यक्ति के जरिए या सिर्फ़ हंगामाखेज़ व्यवहार से वाह-वाही पाकर अपने श्रेष्ठता बोध को तुष्ट करना होता है, वे गंभीर संवादों और चर्चाओं में पड़ते भी नहीं है, कभी-कभार गलतफ़हमियों के चलते फंस भी जाए तो जल्द ही किनारा कर लेते हैं।

यह सही है कि कभी-कभी समय को भी ऐसा लगता है कि कई क्लिष्ट शब्द अनावश्यक रूप से, क्लिष्ट भाषाई अध्ययनों के अभ्यासवश घुस गये हैं। उनसे मुक्ति पाना समय का अभीष्ट है, आप इस ओर लगाता चेताते रहते हैं, समय आपका बहुत-बहुत आभारी है।

आपने यह भी देखा होगा कि जब यहां सामान्य विषयों पर चर्चा की जाती है तो शव्दावली सापेक्षतः सरल और सहज रहती है। दर्शन या और ऐसे ही किसी गूढ़ और गंभीर विषय पर चर्चा करते समय चूंकि मतलब का सटीक होना और वही होना जो उसका मतलब होना चाहिए तथा यह भी कि कोई ऐसा भाषागत लूपहोल्स ना रह जाएं जिससे कि उसका खंड़न या उस पर विवाद पैदा किया जा सके, भाषा थोड़ी सधी हुई तथा क्लिष्ट हो जाती है क्योंकि यह संदर्भ किया जा सकने वाला विवेचन होता है।

ऐसे दार्शनिक ज्ञान के अध्ययन और मनन के बाद प्राप्त समझ के अनुसार फिर साधारण भाषा में बात की जा सकती है, समय करता भी है, तथा आगे यहां और कोशिशें भी होती ही रहेंगी।

शुक्रिया।
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समय अगली बार अपनी श्रृंखला को आगे बढ़ाएगा ही।
संवाद और जिज्ञासाओं का हमेशा स्वागत रहता है ही।

समय

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11 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. आमीन
    अक्टूबर 03, 2009 @ 15:18:31

    thanks

    प्रतिक्रिया

  2. सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi
    अक्टूबर 03, 2009 @ 15:57:16

    आप मेरी बात पर गौर करते हैं यही मेरे लिए सम्‍मान की बात है। आप बात तो जारी रखा करें। मैं तो एक पाठक की हैसियत से कुछ न कुछ बोलता रहूंगा। आप विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं और मैं बोल पड़ता हूं। आपके आगामी लेख का इंतजार रहेगा, अपनी समृद्धि, बुद्धि, कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट के साथ… 🙂

    प्रतिक्रिया

  3. Arvind Mishra
    अक्टूबर 03, 2009 @ 17:57:51

    मान की बात कही है समय ने ! हमें भाषाई मामलों में समझौते नहीं करने चाहिए !

    प्रतिक्रिया

  4. लवली कुमारी / Lovely kumari
    अक्टूबर 03, 2009 @ 18:01:06

    मेरे लिए इस पोस्ट का कोई औचित्य नही है ..आगे के लेखों की प्रतिक्षा रहेगी.

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  5. गिरिजेश राव
    अक्टूबर 04, 2009 @ 11:10:09

    इतना सारा कैसे लिख देते हैं !ईर्ष्या होने लगी है। ..कुछ दिन में दूबा अक्षत लेकर बैठने लगूँगा। कथा सुनूँगा और ध्यान सिर्फ प्रसाद पर रखूँगा।जोर से बोलो समइया की जय !हैं ?ये लवली जी काहे 'नाराज़ सी' लगत हैं?

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  6. समयचक्र - महेंद्र मिश्र
    अक्टूबर 04, 2009 @ 14:28:26

    बहुत बढ़िया पोस्ट . पोस्ट की समयचक्र की चिठ्ठी चर्चा में चर्चा . आभार

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  7. हिमांशु । Himanshu
    अक्टूबर 05, 2009 @ 11:47:22

    भाषा और उसकी प्रयुक्ति के संबंध में आपके विचार सटीक और उपयोगी हैं । सहमत हूँ ।

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  8. महामंत्री - तस्लीम
    अक्टूबर 06, 2009 @ 07:30:17

    आपकी बातों से सहमति व्यक्त करता हूं। भाषा सिर्फ हमारी अभिव्यक्ति का एक माध्यम भर नहीं है, वह हमारे व्यक्तित्व की भी एक स्पष्ट पहचान देती है।-Zakir Ali ‘Rajnish’ { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  9. लवली कुमारी / Lovely kumari
    अक्टूबर 17, 2009 @ 17:39:34

    @गिरिजेश जी आपकी टिप्पणी पर अभी दृष्टि गई …मैं नाराज नही हूँ, हाँ कुछ और बातें थी जिनके कारन मुझे इस पोस्ट का समय द्वारा लिखा जाना व्यर्थ लग रहा था..कब तब हम भाषा की शुद्धता/अशुद्धता के जंजालों में उलझते रहेंगे…कुछ और भी मित्र है जिनसे इस सन्दर्भ में चर्चा हो चुकी है. बस यही कहूँगी की -लोग अपना स्वार्थ साधने के लिये विकास/प्रयास की जड काटने मे लग जाते हैं प्रयास वहीँ बाधित हो जाता है और सारी ऊर्जा विरोध से निपट्ने मे व्यय हो जाती है.मैं ऐसा नही चाहती हूँ शायद इसलिए शब्दों में तल्खी आ गई. आत्मबोध करवाने का धन्यवाद.

    प्रतिक्रिया

  10. समय
    दिसम्बर 19, 2009 @ 15:52:40

    ताहम…की टिप्पणी यह थी:भाषा और संवाद की व्यवस्था पर आपने अच्छे प्रश्न उठाये हैं, मैंने ताहम पर उर्दू में लिखे आलेख में यह बात स्पष्ट कर दी थी कि "ग़ालिब जिस ज़बान में बोलते हैं" "उस ज़बान में नहीं लिखते" ॥ समय ब्लॉग दर्शन जैसे गूढ़ विषयों पर विमर्श कर रहा है, हर क्षेत्र की अपनी भाषा होती है, दर्शन की अपनी अलग भाषा है, साहित्य की अलग, विज्ञान की अलग। हम इस बात से पीछा नही छुड़ा सकते कि हिन्दी जानने वाला भौतिकी के शब्द " बल आघूर्ण" को समझ सके, एक सिद्ध्नता को एक शब्द विशेष में निश्चित करना उस शब्द को क्लिष्ट बना देता है, ये हमारे चेतना का स्तर है, हम क्या पढ़ना चाहते हैं और क्या नहीं..क्लिष्ट शब्द कहीं नहीं होते..Nishant kaushik

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  11. चंदन कुमार मिश्र
    जुलाई 31, 2011 @ 06:28:44

    समय द्वारा भाषा पर यह बात – "हम यहां जाहिरा तौर पर आमजन से संवाद स्थापित नहीं कर रहे हैं। अगर आपको यह गलतफ़हमी है तो उसे समझना और दूर कर लेना चाहिए। आमजन तक तो रोटी, कपड़ा,पानी और बिजली ही नहीं पहुंच पा रही, उसकी नेट और फिर आपके-हमारे ब्लॉगों तक पहुंच हो पाना अभी किसी सपने की ही तरह है। हम उच्च मध्यमवर्गीयों के लिए अपने सुविधासंपन्न कोठरों की निश्चिंतता में कई शब्दों और भाषाई प्रयोगों के मतलब भी बदल गए हैं।"गहराई से उतर गई। लवली जी की बात से मेरा विरोध है कि 'कब तक उलझे रहेंगे'। उलझना तब तक होता है जब तक मामला सुलझ नहीं जाय।भाषा पर इस तरह आपको पढ़ना बड़ा अलग लगा। एकदम सही है कि हर क्षेत्र के शब्द अलग होते हैं और भाषा में कुछ अन्तर भी। यह समझने की चीज है।मैं स्वयं आपके शब्दों में क्लिष्टता महसूस करता हूँ कई बार लेकिन इसमें अचरज क्या है? हमारी इच्छा या हमारे शब्द-ज्ञान से सब कुछ व्यक्त नहीं किया जा सकता।और जो आदमी विकासवाद को मानता है उसे तैयार होना चाहिए भाषा और शब्दों के विकास के लिए भी। और इसलिए भी कि वह आज से दस हजार साल पहले की तुलना में बहुत अधिक भाषा या शब्द का स्तर सुधार चुका रहे। इसलिए नए शब्दों को सीखना ही होगा।

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