दर्शन की अध्ययन विधियां – द्वंदवाद और अधिभूतवाद

हे मानवश्रेष्ठों,
पिछली बार दर्शन के बुनियादी सवाल और उसके जवाबों के अनुसार पैदा हुई दर्शन की भौतिकवादी और प्रत्ययवादी प्रवृत्तियों पर चर्चा की गई थी।
इस बार इन दोनों मुख्य प्रवृत्तियों द्वारा काम में ली जाने वाली तर्कणा और प्रमाणन की भिन्न-भिन्न अध्ययन विधियों को समझने की जुगत भिड़ाते हैं।
समय यहां मानवजाति के अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
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मनुष्य के गिर्द विद्यमान विश्व अविराम बदल रहा है, गतिमान और विकसित हो रहा है। इनमें से कुछ परिवर्तनों की तरफ़ ध्यान नहीं जाता, जबकि कुछ अन्य मनुष्यजाति तथा समग्र प्रकृति के लिए बहुत महत्त्व के होते हैं। असीम ब्रह्मांड अनवरत गतिमान है। यह भूमंडल, यह पृथ्वी निरंतर परिवर्तित हो रही है। जीव-जंतु व वनस्पतियां भी रूपातंरित हो रही हैं। अपने क्रमविकास की लंबी राह में मनुष्य और समाज में निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं।
इस दुनियां में जीवित बचे रहने, उसके अनुकूल बन सकने और अपने लक्ष्यों तथा आवश्यकताओं के अनुरूप इसे बदलने के लिए मनुष्य को इसकी विविधता का अर्थ जानना और समझना होता है। प्राचीनकाल से ही लोग इन प्रश्नों में दिलचस्पी रखते हैं, जैसे विश्व क्या है और इसमें किस प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं? क्या विभिन्न वस्तुओं के बीच कोई संयोजन सूत्र है? विश्व गतिमान क्यों है और इस गति का मूल क्या है?
फलतः ये प्रश्न कि “क्या गति का अस्तित्व है?” और “इस गति का क्या कारण है?” दर्शन के सामने एक और अधिक तथा अत्यंत महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न के रूप में पेश आते हैं। गति के सार, उसके कारणों तथा उद्‍गमों की व्याख्या के साथ जुड़े दार्शनिक चिंतन में विश्व के क्रमविकास के स्पष्टीकरण की दो अध्ययन विधियां साकार हुईं, और विश्व को समझने के उपागम की दो विरोधी विधियां बन गईं – द्वंदवाद ( Dialectics ) और अधिभूतवाद ( Metaphysics )
आइए, इन दोनों विधियों के सार की जांच करते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि इनमें से कौन उपरोक्त प्रश्नों के विज्ञानसम्मत समाधान मुहैया कराती है।
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द्वंदात्मक विधि:
भौतिकवादियों द्वारा प्रयुक्त विधि को द्वंदात्मक विधि कहा जाता है।
संज्ञान की द्वंदात्मक विधि यह मांग करती है कि हमारे गिर्द विश्व की सारी घटनाओं की छानबीन उनके अंतर्संबंधों, अंतर्क्रियाओं तथा उनके सतत विकास की प्रक्रियाओं में की जाए। यह विधि यह मानकर चलती है कि मनुष्य बाह्य जगत तथा स्वयं अपने को केवल तभी जान सकता है, जब वह सारी घटनाओं की जांच तथा अध्ययन उनकी गति में, अंतर्द्वंदों में, सतत परिवर्तन में करे और साथ ही सभी घटनाओं के पारस्परिक संक्रमणों तथा एक दूसरे में उनके पारस्परिक रूपांतरणों पर मुख्य रूप से ध्यान दे।
भौतिकवादी द्वंदवाद के दृष्टिकोण से संपूर्ण विश्व गतिमान और बदलती हुई वस्तुओं का एक समग्र संबंध है। इस सार्विक विश्व संबंध के बाहर न तो किसी अलग-थलग घटना को समझा जा सकता है, न प्रक्रिया को और न ही गति को। इसीलिए द्वंदवाद प्रत्येक विषय, प्रत्येक वस्तु की वैज्ञानिक, वस्तुगत जांच को उसके अधिकाधिक नये पक्षों, रिश्तों और संपर्क सूत्रों को प्रकाश में लाने की एक असीम प्रक्रिया के रूप में देखता है।
यह विधि प्रत्येक तथ्य में विकास के आंतरिक स्रोत का पता लगाने का प्रयत्न करती है। इन स्रोतों को वह अंतर्द्वंदों, अंतर्विरोधों के विश्लेषण में खोजती है, जो प्रत्येक घटना तथा प्रक्रिया के मूल में होते हैं, तथा जिनके आपसी संघर्ष और एकता की वज़ह से ही उस घटना तथा प्रक्रिया का अस्तित्व संभव हो पाता है।
इसके अनुसार विकास का तात्पर्य आवर्तता या एक वृत्तीय गति नहीं है, बल्कि एक वर्तुलाकार ( spiral ) गति है जिसमें नूतन का सतत आविर्भाव होता रहता है, और जो अभिलक्षण पुनरावर्तित होते प्रतीत होते हैं वे पूर्ववर्ती अवस्थाओं से गुणात्मक रूप से भिन्न होते हैं, उनसे उच्चतर अवस्थाओं में होते हैं। विकास के दौरान पुरातन का सतत विखंड़न तथा विलोपन होता है और इस प्रक्रिया में सभी मूल्यवान तथा जीवंत गुणों को संरक्षित रखते हुए नूतन का आविर्भाव होता है।
अधिभूतवादी विधि:
द्वंदवाद की प्रतिपक्षी विधि को अधिभूतवादी विधि कहते हैं।
इसमें प्रत्येक घटना का अलग-थलग ढ़ंग से, घटनाओं के पारस्परिक संबंधों, अंतर्द्वंदों व अंतर्क्रियाओं से अलग करके स्वतंत्र रूप से अध्ययन किया जाता है। यदि उसे इन संबंधों तथा अंतर्क्रियाओं को ध्यान में रखना भी पड़े तो वह सतही तौर पर ही ऐसा करती है। परिवर्तन तथा गति का अध्ययन करते समय अधिभूतवादी विधि वास्तविक विकास को नहीं देखती और इसीलिए प्रकृति, समाज तथा मनुष्य के चिंतन में मूलतः नयी धटनाओं तथा प्रक्रियाओं के उद्‍भव की संभावनाओं को स्वीकार नहीं करती।
इस विधि के अंतर्गत वस्तुओं और परिघटनाओं को अपरिवर्तनीय और एक दूसरे से स्वंतंत्र माना जाता है और इस बात से इन्कार किया जाता है कि आंतरिक अंतर्द्वंद प्रकृति और समाज के विकास के स्रोत हैं।
अधिभूतवादी दृष्टिकोण से विश्व में सब कुछ देर-सवेर पुनरावर्तित होता है, हर चीज़ ऐसे गतिमान होती है, मानो एक वृत में घूम रही हों। इसके अनुसार गति तथा परिवर्तन के स्रोत वस्तुओं और घटनाओं के अंदर नहीं, बल्कि किसी बाहरी प्रेरकों में, उन शक्तियों में निहित होते हैं जो विचाराधीन घटना के संबंध में बाहरी होती हैं।
अधिभूतवादी विधि बाह्य जगत में आमूल गुणात्मक रूपांतरणों और क्रांतिकारी परिवर्तनों को मान्यता नहीं देती, फलतः यह एक विकासविरोधी, यथास्थितिवादी प्रवृत्ति के रूप में समाज के प्रभुत्वशाली लोगों के साथ नाभिनालबद्ध हो जाती है।
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आज इतना ही।
संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।
समय


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7 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. हिमांशु । Himanshu
    सितम्बर 20, 2009 @ 06:23:54

    आपके चिट्ठे को पढ़्कर चिट्ठों की गंभीर प्रकृति का अंदाज लग जाता है । मन से पढ़ने वाली प्रविष्टि । पुनः पढ़कर ही कोई दृष्टि बन पायेगी । आभार ।

    प्रतिक्रिया

  2. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    सितम्बर 23, 2009 @ 04:10:02

    द्वंदवाद का उपयोग तो अधिभूतवादी भी करते रहे हैं। हेगेल का द्वंदवाद भी अधिभूतवादी था, जिस के लिए मार्क्स ने कहा था कि मैं ने हेगेल के सिर के बल खड़े द्वंदवाद को सीधा कर दिया है। दूसरी और बहुत सी भौतिकवादी दार्शनिक प्रणालियाँ द्वंदवादी नहीं हैं। ऐसे में अधिभूतवादी दार्शनिक प्रणालियों को द्वंदवादी प्रणालियाँ कहना उचित तो नहीं?

    प्रतिक्रिया

  3. समय
    सितम्बर 23, 2009 @ 20:05:05

    धन्यवाद द्विवेदी जी,समय यहां सिर्फ़ इन अध्ययन विधियों को, जैसा कि अंततः सुपरिभाषित किया जा चुका है, समेकित कर रहा था। यहां दर्शन के इतिहास से गुजरने का अभिप्राय नहीं था।आपने सही कहा है, पर इसे ऐसे कहेंगे तो और ज़्यादा सही होगा:‘द्वंदवाद का उपयोग तो प्रत्ययवादी भी करते रहे हैं। हेगेल का द्वंदवाद भी अंततः प्रत्ययवादी था…’।द्वंदवाद और अधिभूतवाद विरोधी प्रवृत्तियां है, जाहिर है दोनों साथ-साथ नहीं चल सकती। कभी-कभी अधिभूतवादी प्रवृत्तियां विश्लेषण के वक्त घटनाओं के पारस्परिक संबंधों, अंतर्द्वंदों व अंतर्क्रियाओं को थोड़ा बहुत ध्यान रखने की कोशिश करती प्रतीत होती हैं, जो कि द्वंदवादी तरीका है, पर वे ऐसा सतही तौर पर ही कर रही होती हैं। अगर वे ऐसा वाकई में कर रहीं होती तो क्या कारण हो सकता है कि वे वास्तविकता के यथार्थ परावर्तन तक नहीं पहुंच पाती।मार्क्स ने हेगेल के द्वंदवाद को लगभग जैसा था वैसा ही लेकर आगे विकसित किया और उसे प्रत्ययवादी उपागमों और निष्कर्षों से मुक्त किया। हेगेल की मान्यता थी कि विश्व विरोधी शक्तियों की अंतर्क्रियाओं के फलस्वरूप विकसित होता है, लेकिन उन्होंने इस विकास को एक निरपेक्ष प्रत्यय के, ‘विश्वात्मा’ या ‘विश्व बुद्धि’ से जोड़ दिया। फलतः उनका द्वंदवाद, प्रत्ययवादी हो जाता है।दूसरी बात में आप सही इशारा कर रहे हैं, जैसे कि फ़ायरबाख़ का अपना भौतिकवाद अधिभूतवादी था।यह प्रश्न समझ नहीं आया कि आपका अभिप्रायः क्या है:‘ऐसे में अधिभूतवादी दार्शनिक प्रणालियों को द्वंदवादी प्रणालियाँ कहना उचित तो नहीं?’कृपया स्पष्ट करें।

    प्रतिक्रिया

  4. Suman
    सितम्बर 28, 2009 @ 16:50:00

    nice

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  5. समय
    मार्च 07, 2010 @ 07:10:01

    ताहम से निशांत जी की टिप्पणी:इसी बात को आगे बढाकर यह कह सकते हैं कि, हेगेल के द्वंदवाद का भौतिकवादी पक्ष मार्क्स ने अपनाया और प्रत्ययवादी(प्रतीक रूप में) चिंतन क्षेत्र को मार्क्स ने भौतिकवादी तरीके से कटाक्ष करके उसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के रूप में स्पष्ट किया, जिसका मुख्य सरल सिद्धांत यह है की "प्रकृति की प्रत्येक घटना अंतर्विरोध का परिणाम है "….यह बात भी सही है.. "द्वंदवाद का उपयोग तो प्रत्ययवादी भी करते रहे हैं। हेगेल का द्वंदवाद भी अंततः प्रत्ययवादी था"

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  6. निर्झर'नीर
    अप्रैल 23, 2010 @ 07:26:58

    यक़ीनन आपका हर लेख काबिल-ए-तारीफ़ है ..शब्दों का इतना सही और खूबसूरत प्रयोग ,ज्ञान परक ,सही मायने में दर्शन

    प्रतिक्रिया

  7. Ambrish
    अक्टूबर 08, 2015 @ 15:38:09

    पहली बार समय पर उपलब्ध सामग्री को पढ़ा..बहुत महत्वपूर्ण एवं उपयोगी सिद्ध हुई….
    भविष्य में भी इसी प्रकार समझ बढ़ाने में मदद मिलती रहेगी.

    प्रतिक्रिया

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