टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक-२

हे मानवश्रेष्ठों,
समय यहां श्रृंखला के बीच में कुछ टिप्पणियों को देने की गुस्ताख़ी कर रहा है।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। उम्मीद है आपके दिमाग़ को कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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प्रणय संबंध, विज्ञान और कुछ विचार..पोस्ट पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब किसी एक पक्ष के साथ जड़ता से बंधना नहीं होता, वरन वस्तुगतता का सापेक्ष, तार्किक और तथ्यात्मक विश्लेषण करने की योग्यता पैदा कर सकने वाले नज़रिए से होता है।

किसी भी दृष्टिकोण या सिद्धांत का असली परीक्षण, व्यवहार के जरिए ही हो सकता है। यही इसकी कसौटी होती है कि वह प्रकृति और जीवन की वास्तविक परिघटनाओं को कितनी सटीकता और accuracy के साथ समझाने की सामर्थ्य रखता है। उसका सामान्यीकरण किया जा सकता है या नहीं? प्राप्त निष्कर्षों और नियमसंगीतियों से उसके जरिए भावी परिघटनाओं या संबंद्ध अन्य प्रक्रियाओं को नियत किया जा सकता है या नहीं?
…..
और यह बात आपके प्रथम मत ‘मैं अपना मत स्पस्ट कर दूँ मेरे अनुसार १०० प्रतिशत प्रेम की भावना दिमाग में पनपती है’ से जाहिर नहीं होती।
वरन यह जाहिर होती है इसके सापेक्ष बालिका वधु वाले प्रसंग को रखने और यह प्रश्न उठाने में कि,‘क्यों उसने फिर कहीं और प्रेम तलास नही किया,क्यों वह उसकी याद में तडपता रहा..?’।

यह बात थोड़ी अंतर्विरोधी लग सकती है।

पर यह बात इसलिए कही गयी है कि यदि वाकई में मस्तिष्क का केमिकल लोचा वाला सिद्धांत इस प्रेम की रूहानी? भावनात्मक, तथ्यात्मक वस्तुगतता को अगर समझाने में समर्थ नहीं लग रहा है तो इसका मतलब सिद्धांत में ही कहीं लोचा है। कहीं ना कहीं उसमें लूपहोल्स हैं और वह पूरी तरह से एक सही सिद्धांत होने की काबिलियत रखने से अभी दूर है।

तो एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वही है जो इन अंतर्विरोधों को भी परखे, इन पर संदेह करे, और सापेक्षता में भी चीज़ों को देखे। यही आप ने किया भी है। आपको सलाम।

जाहिर है, उपरोक्त बात को कह देने के बाद, यह कहना अब प्रांसंगिक नहीं रह गया है कि समय के यहां संदर्भित आलेख से जो यह निष्कर्ष आपने निकाला है कि,‘हमारे मित्रों का मानना है की रूहानी प्रेम एक मायाजाल से ज्यादा कुछ नही है’,पूरी तरह वस्तुगत नहीं है, एकांगी है।

समय को मौका मिलेगा तो यह कोशिश होगी कि इसी संदर्भ में भावनाओं की भौतिकता, वस्तुगतता और सक्रिय आवेगों के आपसी अंतर्संबंधों पर मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान को अपने ब्लॉग पर समेकित कर सके।

समय, यहां कुछ इशारे भर कर रहा है।

मनुष्य द्वारा अनुभव की गयी भावनाएं (अनुभूतियां), प्रेम की भावना जिनका कि एक अंग मात्र है, मनुष्य के वे आंतरिक, मानसिक रवैये हैं, वह एक मानसिक अवस्था है, जिन्हें वह अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं में और अपने सक्रियता की लक्ष्य वस्तुओं के प्रति विभिन्न रूपों में महसूस करता है।

इनके पैदा होने का निश्चय ही अपना भौतिक आधार होता है, और जाहिरा तौर पर यह केमिकल/भौतिक लोचों की प्रक्रियाओं से गुजर कर ही महसूसने जैसी अवस्था पाती हैं।
परंतु महसूसने के पश्चात अब यह नितांत भौतिक चीज़ नहीं रह जाती, यह मनुष्य के वैचारिक जगत से अंतर्क्रिया के दौरान उसका ही एक हिस्सा हो जाती हैं, उसी वैचारिक जगत का जो कि ख़ुद उसकी भौतिक परिस्थितियों से निगमित है।

वैचारिक जगत के पूर्वाधारों के अनुसार ही ये भावनाएं मनुष्य के संवेगों और सक्रियताओं को निश्चित करती हैं, यानि उसके व्यवहार को निश्चित करती हैं, जैसा कि आपके एडगर एलन पो का वह व्यवहार आपकी चिंता का विषय है।

भौतिक और वैचारिक जगत जीवन का अलग-अलग हिस्सा नहीं है, वह दोनों एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं।
……..
ज्ञान का मामला ही ऐसा है। चीज़ों को अधिभूतवादी नज़रिए से अलग-अलग विश्लेषित करने से उलझनें पैदा होती है, और द्वंदात्मक तरीके से विश्लेषित संक्षेप में नहीं किया जा सकता।’
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यह इश्क कमीना-क्या सचमुच?…पोस्ट पर ‘साईब्लाग’ पर टिप्पणी:

आलेख की सूचनाओं को मानवश्रेष्ठ अरुणप्रकाश की टिप्पणी से अंतर्संबंधित करके भी देखे जाने की आवश्यकता है।
मानवव्यवहार को मात्र कुछ रसायनों तक सीमित कर देने से, इन्हें वैज्ञानिक रूप से, प्रगतिशील मूल्यों के रूप में स्थापित कर देने से, जाहिरा तौर पर इन रसायनों से संबंधित एक गैरजरूरी बाज़ार खड़ा किया जा सकता है और मुनाफ़ो का ढ़ेर लगाया जा सकता है।

दूसरा ऐसा स्थापित करने से मानवीय व्यवहार की सामाजिक अंतर्निर्भरता के बज़ाए व्यक्तिवादी आत्मकेन्द्रिता को आधार मिलता है, क्योंकि यह भ्रम स्थापित किया जाता है कि इन्हें कुछ रसायनों के जरिए पैदा और नियंत्रित किया जा सकता है।
जाहिरा तौर पर ऐसे आत्मकेन्द्रित व्यक्तिवादी सोच के मनुष्य आज की व्यवस्था के इच्छित हैं जो मनुष्य की सोच और दृष्टिकोणों तक को गुलाम मानसिकता में बदल डालने की कोशिशों में हैं।

जैसा कि आपने अपने एक आलेख में पहले कहा था कि विज्ञान धर्म के बिना अंधा होता है, और समय की इल्तिज़ा थी कि यहां धर्म के स्थान पर दर्शन शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इच्छित अर्थ इसी में समाहित हैं। उसी परिप्रेक्ष्य में यह है कि वैज्ञानिक सूचनाओं को, ऐतिहासिक और क्रम-विकास के संदर्भों में परखे बिना सही समझ विकसित नहीं की जा सकती, या कि इन्हें सही समाजिक सोद्देश्यता प्रदान नहीं की जा सकती।

आपने आलेख में इसी दृष्टि को उठाया भी है।

इन हारमोनों के खेल को हम लगभग पूरी जैवीय प्रकृति में (फिलहाल मानव को छोड दें) अस्तित्वमान देखते हैं और इन्हीं की वज़ह से उत्प्रेरित सहजवृत्तियों से सक्रिय कई जीवों को समयआधारित प्रजनन संबंधों की प्रक्रिया में संलग्न देखते हैं। जाहिर है इसी वज़ह से यह विचार और शोध की आवश्यकताएं पैदा हुईं कि इन्हीं के परिप्रेक्ष्य में मनुष्यों के व्यवहार को भी समझा जाना चाहिए।

मनुष्य भी इसी जैव प्रकृति का अंग है तो नियमसंगति यहां भी मिलनी चाहिए, और इसी के अवशेषों को जाहिर है उक्त खोजों के अंतर्गत संपन्न कर लिया गया लगता है।

मानव प्रकृति की सहजवृत्तियों के खिलाफ़ अपने सोद्देश्य क्रियाकलापों के जरिए हुए क्रमविकास के कारण ही अस्तित्व में आ पाया है। मनुष्य अपनी इस चेतना के जरिए ही यानि सचेतन क्रियाकलापों के जरिए ही, अन्य जैवीय प्रकृति की सहजवृत्तियों से अपने आपको अलग करता है। (आपने इन सहजवृत्तियों के लिए अपने प्रश्न में सहजबोध शब्द काम में लिया है, ये दोनों पर्यायवाची नहीं हैं)

जाहिर है अब मनुष्य कई सहजवृत्तियों के हारमोनों संबंधी उत्प्रेरकता की आदतों से आगे निकल आया है और कई नई तरह की सचेत क्रियाकलापों के लिए अनुकूलित हो गया है।

इस आलेख में उल्लिखित हारमोन और अंडविसर्जन संबंधित व्यवहार को इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जांचा जाना चाहिए।

यह आसानी से जाना जा सकता है, अपने स्वयं के व्यवहार से महसूस किया जा सकता है कि मनुष्य में अब इस गंध संबंधी सहजवृत्ति का कोई सामान्य अस्तित्व नहीं रह गया है। मनुष्य के यहां यौन संबंधों की सिर्फ़ प्रजनन आवश्यकता का लोप हो गया है और यह कई तरह के आनंदों और गहरे आत्मिक संबंधों के आधार के रूप में अस्तित्व में आ गया है। अब शारीरिक और मानसिक जरूरतों के अतिरिक्त भी कई ऐसे उत्प्रेरक हैं जो मनुष्य में यौन संबंधों की प्रेरणा पैदा कर सकते हैं।

अंड़विसर्जन के वक्त स्त्रियों में आ रहे हार्मोनिक बदलावों की वज़ह से उत्प्रेरित यौन आकांक्षाओं के कारण से हुए व्यवहार परिवर्तन से ही कोई पुरूष शायद यह अहसास पा सकता है कि अंड़विसर्जन हो रहा होगा। गंध संबंधी कोई अनुभव सामान्यतयाः नहीं महसूस किया जाता, इसे अपने खु़द के अनुभवों की कसौटी पर भी परखा जा सकता है।

पसीने में गंध को भी ऐसे ही देखा जा सकता है। इससे भी कई फ़िल्मी और साहित्यिक प्रंसंगों के कारण विश्वास मिलता हो, तथ्य यही है कि वर्जनाओं से युक्त कुछ कैशोर्य व्यवहारों में इसका कुछ अस्तित्व भले ही मिल जाए, सामान्यतयाः व्यस्क जोडो में इस पसीने की गंध से वितृष्णा ही देखी जा सकती है, और सामान्यतयाः जहां तक संभव होता है सचेत यौन संबंधों हेतु शयनकक्ष में स्नान करके जाना ही श्रेयस्कर समझा जाता है।’
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धर्म और विज्ञान…पोस्ट पर ‘साईब्लाग’ पर टिप्पणी:

शब्दों का आशय वही होता है जो प्रदत्त समय में उसके प्रचलित अर्थ में ध्वनित होता है।

धर्म के मूल में आस्थाएं और परंपराएं होती है।
वहां संदेह और तर्क के लिए सामान्यतयाः कोई जगह नहीं होती।

तर्कबुद्धि के जरिए जब विश्व और मनुष्य के साथ उसके संबंधों की तार्किक व्याख्याएं की जाने लगी तो उसे एक नये शब्द फ़िलासाफ़ी से पुकारा जाने लगा।

इस शब्द का ही हमारा पारंपरिक पर्याय दर्शन है।

संदेहों ने विज्ञान तक पहुंचाया, और तर्कों ने दर्शन तक। दोनों एक दूसरे से नाभिनालबद्ध हैं।

दर्शन के तार्किक निष्कर्षों ने विज्ञान के लिए ऊर्वर भूमि प्रदान की, वहीं विज्ञान की खोजों और नियमसंगीतियों ने दर्शन को एक सार्विक रूपता प्रदान की।

आप के लेख और अन्योनास्ति की टिप्पणी में जो आकांक्षा ‘धर्म’ शब्द से इच्छित है, वह आपको इस ‘दर्शन’ शब्द में ही मिल सकती है।’
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ज्योतिष: पौराणिक संदर्भों से निकली….पोस्ट पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

यहां यह जो सत्संग चर्चा चल रही है, उस पर इस नाचीज़ को कुछ नहीं कहना है।
आस्था को तर्कों के जरिए दिमाग़ से नहीं निकाला जा सकता, बिल्कुल उसी तरह जैसे ड़र को तर्कों के सहारे नहीं जीता जा सकता।
वैसे इस बात को देखने में मज़ा आता है, कि आस्थावान मनुष्य जो कि तर्क को किनारे रखता है, इसके बचाव में सबसे ज़्यादा तर्क-कुतर्क करता है। जिस पर विश्वास नहीं उसी पद्धति का सहारा। खैर जी।
ज्ञान और समझ हमारे सारे बचकानेपन को शनै-शनै खत्म करती जाती हैं।

इस पोस्ट पर समय का भी प्रतिवाद है, और गहरा है। कृपया इसे भी दर्ज़ कर लें।

आप वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए यहां जिस पद्धति को काम में ले रहे हैं, मुआफ़ कीजिएगा समय को लगता है यह कतई भी वैज्ञानिक नहीं है।
दर्शन की भाषा में कहें तो यह चीज़ों को समझने का अधिभूतवादी तरीका (metaphysical method)है, वैज्ञानिक द्वंदवादी तरीका नहीं है।
आप अपने विरोधी विचार को उन्हीं की ज़्यादा प्रचलित पद्धति के जरिए मात देने की खाम्ख़्वाह कोशिश कर रहे हैं।
विवाद इसी वजह से होता है। जब इसी कार्य को प्रतिगामी शक्तियां करती हैं तो गलत है, तो सही चीज़ों को ही सही, सामने लाने के लिए प्रगतिशील शक्तियां भी इसी गलत चीज़ का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। जाहिर है उनके तर्कजाल में उलझने की पृष्ठभूमि तो पहले से ही तैयार है।

इस तरह से पुरातन ग्रंथों से, जो कि अपने ऐतिहासिक काल की समझ की उत्पत्ति होते हैं, उदाहरण ढ़ूंढ़ कर लाने और उसे वर्तमान में प्रतिष्ठित करने का यह पुनीत कार्य ही तो आज की प्रतिगामी शक्तियां कर रही है। तो फिर इस पोस्ट के जरिए उलटबासी में ही सही, क्या यही कार्य यहां नहीं हो रहा है, क्या उन्हीं की पद्धति नहीं अपनाई जा रही है।

पुरातन ग्रंथों की कई वैज्ञानिक द्वंदवादी व्याख्याएं मानवजाति द्वारा पूर्व में ही की जा चुकी हैं, आपका समूह उनसे गुजरेगा तो सही मायनों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया जा सकेगा।

इस हेतु भारतभूमि पर भी काफ़ी मानवश्रेष्ठ यह कार्य संपन्न कर चुके हैं। आप अमृत डांगे, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, दामोदर धर्मानंद कोसांबी आदि विद्वानों और इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ सकते हैं। आपके समूह को दर्शन से भी गुजरना चाहिए। द्वंदवादी ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से भी माथापच्ची करनी चाहिए।

आपने जो उद्धरण दिये हैं, क्या उनमें यह नहीं देखा जाना चाहिए था कि आखिर धर्म और ज्योतिष की नाभीनालबद्धता के बाबजूद इन धर्मग्रंथों में ज्योतिष पर यह दृष्टिकोण क्यों अपनाया गया है? क्या इसमें आपकों कोई पेच नज़र नहीं आया?
आप जल्दबाज़ी में थे, अपने अनुकूल लगती सी इस नई प्राप्त बात को सामने लाने के लिए।

धर्मग्रंथों में अपने विरोधी विचारों के ख़िलाफ़ निर्देश जारी किये जाते हैं, नाकि अपने अनुकूल साबित होने वाली चीज़ों को नकारा जाता है।

यही तथ्य क्या काफ़ी नहीं था, कि शक होना चाहिए था कि जाहिरातौर पर यहां उस वक्त भी प्रचलित फ़लित ज्योतिष के बारे में तो यह बातें कही ही नहीं जा सकती थी। आखिर कौनसा दृष्टिकोण अपने पैरों पर खु़द कुल्हाडी मारेगा।

हालांकि समय अभी इनकी गहराई में नहीं गया है, परंतु उपरोक्त बात तो कही ही जा सकती है।

भाववादी या आदर्शवादी या प्रत्ययवादी धर्मग्रंथों में उस वक्त में प्रचलित भौतिकवादी, यथार्थवादी दृष्टिकोणों पर फ़तवे जारी किए जाते थे। ज्ञान और समझ विकसित करने वाले हर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कुचलने की कोशिश की जाती थी। सांख्यों, चार्वाकों आदि के खिलाफ़ यही किया गया था।

अगर यह सही है, तो जाहिर है कि ग्रहों और नक्षत्रों का ज्ञान रखने वालों या इनपर शोध करने वालों या इन्हें पढ़ने-पढा़ने वाले जिन लोगों की चर्चा की जा रही है, वे उन धर्मग्रंथकारों के लिए खटकने वाले ही रहे होंगे।

जाहिर है फिर वे फलित ज्योतिष के जरिए मनुष्य के भाग्य की भविष्यवाणियां करने वाले तो नहीं ही रहे होंगे। हां वे लोग वे हो सकते हैं, जो कि ग्रहों और नक्षत्रों की स्थितियों और गतियों का प्रेक्षण करने और इनका विज्ञान विकसित करने की कोशिश कर रहे थे, और जाहिरा तौर पर ग्रंथिक प्रस्थापनाओं को चुनौती दे रहे होंगे।

यहां यह भी हो सकता है कि ये उक्तियां भौतिकवादी दार्शनिक परंपरा के ग्रंथों और उनके उद्धरणों से ली गयी हो। सीधे वहीं से, या किसी कारण भाववादी ग्रंथों में भी स्थान पा गई हों। अगर यह भौतिकवादी परंपराओं की हैं, तो जाहिर है इनका भाववादियों के फलित ज्योतिष के ख़िलाफ़ होना ही है। हालांकि इसकी संभावना कम ही है, क्योंकि ये मनुस्मृति में भी स्थान पा गई हैं।

क्या यह सब सोचा और देखा समझा गया था?

मुआफ़ी की दरकार है।
परंतु गंभीर समीक्षा और सही पद्धति का अभाव लगा इसलिए इतना कुछ लिख गया।’

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स्वाइन फ़्लू संबंधी पहेली….पोस्ट पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

सावधानी तो ठीक लगती है।
पर अन्य परिप्रेक्ष्यों की भी जाँच कर ही लेनी चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि जागरुकता के भ्रम में हम ड़र फैला रहे हों।

समय भी मुनाफ़े की अभेद्य दीवारों के पीछे झाँकने में अपने आप को अक्षम पाता है।

परंतु फिर भी ऐसी सूचनाएं/अफ़वाहें भी है, जिन्हें भी जितना हो सके जाँच कर चेतावनियों के साथ रख दिया जाए, तो थोड़ा ठीक रहे।

पहली: यह वायरस अमेरिका की उन्नत लैबों में परीक्षणों की एक श्रृंखला के अंतर्गत पैदा किया गया था, या हुआ था। यह बाहर कैसे?

दूसरी: स्वाईन फ़्लू की दवाईयां और जांच किट दे सकने वाली शायद तीन ही कंपनियां थी, और वे भी इस वायरस के फैलने से पहले, मंदी के दौर की तंगी से दिवालिया होने की कगार पर थी।
अब उनके मुनाफ़े की गणना के कयास तो लगाए ही जा सकते हैं।

तीसरी: थोडे़ दिनों बाद ही संयुक्त राष्ट्र ने घोषणा कर दी थी कि जल्द ही पूरे विश्व में इसका टीका उपलब्ध करा दिया जाएगा।
मज़े हो गये, विश्व मीडिया और हमने एक सार्विक ड़र का माहौल तैयार कर ही रखा है, बस टीका आने की देर है।
हम डरे हुए, सहमे हुए लोग मनमाने दामों पर इस टीके को लगवाने के लिए लाईनों में लगे होंगे, और अमेरिका और मल्टीनेशनल्स को शुक्रिया अदा कर रहे होंगे।
दवाइयां तो सिर्फ़ बीमार खाते हैं, पर टीका तो पूरे विश्व में किस पैमाने की खपत रखेगा, आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ ही दिनों पहले हेपीटाइटिस बी का टीका भारत के अधिकतर मध्यम और उच्च वर्ग के भारी दामों में ठोक दिया गया था, बिना ये बताए कि सामान्यतयाः इससे प्रभावित होने की सम्भावनाएं यहां कितनी हैं।

और बता भी दो तो क्या है। ड़र है ज़िंदगी का, और यदि पैसे निकाले जा सकते हों जेब से तो जोखिम क्यों उठाया जाए।

यह भी अफ़वाह है कि पूरे वैश्विक स्तर पर जो मंदी छाई हुई है, इसके जनक उन्नत देशों का यह एक घिनौना षड़यंत्र है जो उन्हें मंदी से उबारने की गारंटी देने की क्षमता रखता है।’

०००००००००००००००००००००

समय अपनी श्रृंखला को अगली बार जारी रखेगा ही।

समय

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7 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Arvind Mishra
    सितम्बर 10, 2009 @ 03:49:13

    अच्छा संकलन है -‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब किसी एक पक्ष के साथ जड़ता से बंधना नहीं होता, वरन वस्तुगतता का सापेक्ष, तार्किक और तथ्यात्मक विश्लेषण करने की योग्यता पैदा कर सकने वाले नज़रिए से होता है।वस्तुगतता का सापेक्ष के बजाय क्या निरपेक्ष नहीं होना चाहिए यद्यपि प्रेक्षक निरपेक्ष नहीं रह सकता -दृष्टि भेद तो रहेगा ही !

    प्रतिक्रिया

  2. हिमांशु । Himanshu
    सितम्बर 10, 2009 @ 03:51:13

    हाँ, निश्चय ही यहाँ प्रस्तुत कुछ टिप्पणियाँ विरम गयीं थीं । आभार ।

    प्रतिक्रिया

  3. Ashish Khandelwal
    सितम्बर 10, 2009 @ 05:05:12

    अच्छा संकलन और विवेचन.. हैपी ब्लॉगिंग

    प्रतिक्रिया

  4. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    सितम्बर 10, 2009 @ 05:17:21

    इन टिप्पणियों को पढ़ना अपने आप में उपलब्धि हो गई। यह ब्लाग ब्लाग जगत में बहुत बड़ा काम कर रहा है।

    प्रतिक्रिया

  5. लवली कुमारी / Lovely kumari
    सितम्बर 10, 2009 @ 06:14:55

    समय की यह बहुमूल्य टिप्पणियाँ अंतर्जाल के इन्ही पन्नो में संगृहीत रहें…ऐसी कामना है.

    प्रतिक्रिया

  6. समय
    सितम्बर 10, 2009 @ 16:28:03

    @ अरविंद मिश्रा:धन्यवाद मिश्रा जी,आपकी पैनी दृष्टि, और जिज्ञासात्मक भूख काबिलेतारीफ़ है।आजकल इसका बहुत अभाव है, और इसी के साथ आपने ब्लॉग जगत में विचार और वैज्ञानिकता की जो अलख जला रखी है वह एक बेहद जरूरी और सामयिक है और इतिहास बना रही है।सापेक्षता और निरपेक्षता के अंतरविरोध पर आपने खूब नज़र ड़ाली है।वस्तुगतता का सापेक्ष विश्लेषण से तात्पर्य, उसके अन्य वस्तुओं जिसमें की कई बार प्रेक्षक भी शामिल होता है, के साथ अंतरसंबंधों के सापेक्ष विश्लेषण से होता है।प्रेक्षक का उसके साथ निरपेक्ष रहने से तात्पर्य उस वस्तु विशेष के साथ उसके हितों, concerns और पूर्वाग्रहों से मुक्त रहने से होता है।निरपेक्ष दृष्टि और सापेक्ष विश्लेषण के बिना वास्तविकता का पूर्ण परावर्तन संभव नहीं हो सकता। इसी प्रणाली से वास्तविकता के प्रति एक सार्विक दृष्टिकोण पैदा हो सकता है।यह अक्सर नहीं हो पाता और इसीलिए दृष्टि भेद पैदा होते हैं। एक ही वास्तविकता अलग-अलग लोगों में भिन्न-भिन्न तरह से परावर्तित होती है।शुक्रिया।

    प्रतिक्रिया

  7. भूतनाथ
    सितम्बर 11, 2009 @ 03:57:54

    ओह…बाबा रे बाबा…हम तो प्यार को प्यार समझने की भूल कर बैठे…..आगे से ऐसी गलती नहीं करेंगे….सॉरी….कान पकड़ते हैं…..अरे भई अब माफ़ भी करो ना….धत्त…अब हमने ये तो नहीं कहा कि आपने बढ़िया नहीं लिखा…..अरे भई अच्छा लिखा.. अच्छा लिखा….अच्छा लिखा….टैंक यू…अरे फिर सॉरी….थैंक यू……सच्ची….मुच्ची….!!

    प्रतिक्रिया

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