दर्शन और दुनिया को देखने का नज़रिया

हे मानवश्रेष्ठों,
पिछली बार समय ने दर्शन क्या है? क्यों हैं? पर चर्चा करके दर्शन पर एक सामान्य दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की कोशिश की थी, ताकि इस शब्द से एक सटीक मतलब लिया जा सके।

उसी पोस्ट पर जोशी जी की टिप्पणी से एक महत्वपूर्ण बात उजागर होती है, वह है इस शब्द ‘दर्शन’ पर आम सामान्य दृष्टिकोण क्या है। इससे यह बात भी समझ में आती है कि लोक में भी यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि दर्शन का मतलब उस व्यक्ति विशेष की तार्किक समझ और चीज़ों को देखने के उसके नज़रिए से है। इसीलिए जोशी जी यह अपना मत, एक आम मत था, जिसमें उन्होंने कहा था कि हर विषय का अपना एक दर्शन होता है, ओशो से लेकर चाय वाले तक का दर्शन भी एक दर्शन ही है। उन्होंने चार्वाक का जिक्र करके अच्छा हुआ मुझे याद दिलाया कि हमें बाद में कभी इस पर भी चर्चा करनी है, अतएव यह हम बाद में कभी देखेंगे कि चार्वाक दर्शन में कितना मज़ाक था और कितनी गंभीरता। जोशी जी को धन्यवाद कि चर्चा और संवाद को उन्होंने आगे बढा़या।

तो अब ऐसा लग रहा है कि उक्त बात का ही सूत्र पकड़ा जाए और यह देखा जाए कि आखिर फिर शास्त्रीय तरीके से कैसे व्यक्ति विशेष के चीज़ों के प्रति आम नज़रिए यानि दृष्टिकोण एवं रवैये को किस तरह से दर्शन से अलग देखा जा सकता है, और साथ ही यह भी कि इनके बीच आपसी संबंध क्या हैं।

चलिए, चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।
दर्शन और विश्व को देखने के मनुष्य के नज़रिए यानि उसके विश्वदृष्टिकोण के बीच क्या संबंध होता है, इसे समझने की कोशिश करते हैं।
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अपने दैनन्दिनी जीवन से जुड़े मामलों, मसलन, शाम कैसे गुजारी जाए, क्या खाया जाए, कहां जाया जाए, आदि-आदि, में मनुष्य उस समय की मनोदशा, अपनी आदतों और तत्कालीन संभावनाओं से निर्देशित होते हैं।

किंतु जीवन में कई ऐसी समस्याएं भी होती हैं जिनसे जूझने के लिए उसे दृढ़विश्वासों की, दुनिया को देखने के एक व्यापक नज़रिए यानि दृष्टिकोण की और मानव जीवन के लक्ष्यों तथा अर्थ की सुस्पष्ट समझ की जरूरत होती है। बुनियादी विश्वासों, विश्व और उसकी संरचना व उत्पत्ति, मानव जीवन के आशय तथा उद्देश्य, और समसामयिक वास्तविकता में मनुष्य के स्थान के बारे में उसके दृष्टिकोणों की समग्रता को उस व्यक्ति विशेष का विश्वदृष्टिकोण कहते हैं

परिवेशीय जगत से मनुष्य के संबंध का सिद्धांत विकसित करने वाला दर्शन, विश्वदृष्टिकोण के वस्तुतः केंद्र में स्थित होता है। विश्वदृष्टिकोण की रचना में दर्शन के अलावा विज्ञान, कला, धर्म, विभिन्न राजनीतिक मत, देश विशेष का इतिहास, आदि भी भाग लेते हैं। इसके स्वभाव पर लोगों की जीवन पद्धति, उनके दैनिक क्रियाकलापों और उत्पादक क्रियाकलापों की छाप होती है।

लेकिन विश्वदृष्टिकोण की प्रणाली में दर्शन का एक विशेष स्थान होता है। यह क्या है?

दर्शन विश्वास पर कुछ भी स्वीकार नहीं करता। इसकी उत्पत्ति के समय से ही दार्शनिकों ने हमेशा अपनी प्रस्थापनाओं को प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है। उन्होंने उनके मंडनार्थ युक्तियां प्रस्तुत कीं, सटीक और अकाट्‍य प्रमाणों के बारे में सिद्धांतों का विकास किया। साथ ही अपने प्रतिपक्षियों के विचारों का खंडन करते हुए दार्शनिकों ने आलोचनात्मक युक्तियों व तर्कणा के क़ायदों का विकास किया। उन्होंने किन्हीं विशेष विचारों को महज़ ठुकराया नहीं, बल्कि ऐसी ठोस, अकाट्‍य युक्तियां प्रस्तुत कीं, जिनसे उनका खंडन हो गया।

इसी तरह विश्व के बारे में कुछ दृष्टिकोणों को प्रमाणित करके तथा उनमें मनुष्य के स्थान को दर्शा करके एक दार्शनिक प्रणाली अपने अनुरूप विश्वदृष्टिकोण को प्रमाणित करती है। फलतः दर्शन किसी भी मनुष्य के विश्वदृष्टिकोण का सैद्धांतिक आधार होता है
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प्रत्येक ऐतिहासिक युग का अपना ही विश्वदृष्टिकोण था। यह दृष्टिकोण तत्कालीन समाज, विज्ञान, तकनीक तथा संस्कृति, सभी के विकास के स्तर पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे समाज में विभिन्न वर्गों का उद्‍भव होता जाता है, वैसे-वैसे ही विश्वदृष्टिकोण का स्वभाव भी वर्गीय होता जाता है। दासों और दास-स्वामियों, भूदासों और ज़मींदारों, मज़दूरों और पूंजीपतियों के भिन्न-भिन्न विश्वदृष्टिकोण होते हैं और मनुष्य की भूमिका तथा उद्देश्यों की उनकी समझ भी भिन्न-भिन्न होती है।

जाहिर है इन वर्गों के हित अलग-अलग होते हैं और आपस में टकराते हैं, अतएव प्रत्येक वर्ग अपने विश्वदृष्टिकोण का मंड़न और वैरी वर्गों के दृष्टिकोणों का खंड़न करने का प्रयास करता है। जो दार्शनिकगण किसी एक वर्ग के हितों की सफ़ाई देते हैं, वे इन्हीं के अनुरूप सिद्धांतों का, इन्हीं के पक्ष की युक्तियों का विकास करते हैं और वैरी दृष्टिकोणों के विरूद्ध संघर्ष के लिए आलोचनात्मक दलीलों को भी परिष्कृत तथा प्रखर बनाते हैं।

विश्वदृष्टिकोणों के रूप में दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका इसी में प्रकट होती है।
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तो हे मानवश्रेष्ठों,
अगली बार हम दर्शन के बुनियादी सवाल से गुजरते हुए, चेतना की उत्पत्ति और विकास संबंधी चर्चा की ओर आगे बढ़ेंगे।

आप यहां से गुजरते रहें।

आलोचनात्मक और जिज्ञासात्मक संवादों का स्वागत है।

समय

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8 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    सितम्बर 05, 2009 @ 17:19:03

    क्लास अच्छी है जी, कुछ कुछ समझ भी आया।

    प्रतिक्रिया

  2. गिरिजेश राव
    सितम्बर 05, 2009 @ 17:28:04

    अगर बहुत हानि होने की सम्भावना न हो तो अपनी पहचान उजागर करें। सरल सा अनुरोध है, दार्शनिक मीमांसा की आवश्यकता नहीं है। जिस आइने से दिमाग रूबरू हो उसे पहले पहचानना आवश्यक है।आज के लेख की सरलता पर मैं मुग्ध हो गया हूँ।" दासों और दास-स्वामियों, भूदासों और ज़मींदारों, मज़दूरों और पूंजीपतियों …" को दिशा, आधार, अस्तित्त्व आदि देती भारत में एक सशक्त अवधारणा रही है – जाति की। क्या उसके ऐतिहासिक विकास, वर्तमान में औचित्त्य और उपयोगिता और इस पर कि क्या नगरीकरण अंतत: इसे समाप्त कर देगा?, कुछ प्रकाश डालेंगे। इसलिए अनुरोध कर रहा हूँ कि देखने के लिए मुझे जो रोशनी चाहिए, वह यहाँ हमेशा मिली है।

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  3. सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi
    सितम्बर 05, 2009 @ 22:19:42

    निजी तौर पर विश्‍वदृष्टिकोण का विश्‍लेषण अपने आप में व्‍याघात लगता रहा है मुझे। ई एच कार ने ऐतिहासिकतावाद में स्‍पष्‍ट भी किया है कि एक इतिहासकार समय के फलक पर उड़ती हुई चील नहीं होता बल्कि उस समूह का भाग होता है जो परिस्थितियों को भोग रहा होता है। ऐसे में दुनिया के किसी एक कोने में बैठा आदमी विश्‍वदृष्टिकोण की बात करे तो कुछ कम पचती है। यहां विश्‍वदृष्टिकोण की बजाय मनुष्‍य का संकीर्ण दृष्टिकोण विश्‍व के प्रति कहना क्‍या अधिक उपयुक्‍त नहीं रहेगा। यह मेरा विचार है… आपने मेरी बात को समझा और आगे बढ़ाया इसके लिए आभार। इस बार दूसरा सवाल उछाल रहा हूं 🙂

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  4. Udan Tashtari
    सितम्बर 06, 2009 @ 00:05:46

    एक बार पढ़ लिया..फिर पढ़ेंगे जरुर.

    प्रतिक्रिया

  5. नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop
    सितम्बर 07, 2009 @ 14:48:32

    padh liya hai… apni samajh jitna samajh bhi liya hai… agli post ka intezatr rahega.dhanyawaad.Rashmi.

    प्रतिक्रिया

  6. ताहम...
    सितम्बर 08, 2009 @ 08:44:47

    Jo dekhne ki koshish ki jaye vah darshan ka pryas hai, jo dikh raha hai use dekha jaye vah darshan hai…..mere anusaar…darshan jagat kee meemansa karte hain,,shayad yahi tathy hai,, dharm yukti hai….aur darshan tathy hai..ab samasya ye ki darshan ka kaary kya bhutpurv vicharon ki samalochna ya fir naye siddhant pratipadit karna hi hai…is tarah se darshan ko kya kisi vishesh praprekshy matr ke liye maan liya jaye..chinki adhiktam darshan apne sameecheen vicharon ko lekr chalte hain…is wjh se bhi ve sirf vishv ka hi apna drishtikon pratipadit kar pate hain, na ki vishv hetu….nidaan ka bhaav isiliye nahi pata kyunki "adhiktam" daur ki samasyayon aur " drishtikon" jaise shabdon ka arth hi nahi smajhte….acha aalekh hai….nishant kaushik

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  7. कविता
    सितम्बर 08, 2009 @ 11:39:22

    बहुत गम्भीर चर्चा है। दिमाग लगाना पडेगा।Think Scientific Act Scientific

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  8. अविनाश वाचस्पति
    सितम्बर 30, 2009 @ 16:54:32

    देखिए मैं तो इस पोस्‍ट तक नहीं पहुंचापर पोस्‍ट मुझ तक पहुंच गईयह सब जनसत्‍ता का चमत्‍कार हैइसी अखबार में यह पोस्‍ट हुई30 सितम्‍बर 2009 को संपादकीय पेज परसमांतर स्‍तंभ में हुई साकार हैअब पढ़ कर करना इस पर विचार है।

    प्रतिक्रिया

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