मनुष्य की सामाजिक सापेक्षता….

हे मानव श्रेष्ठों,

पिछली बार हमने प्रेम पर बात करते हुए मनुष्य की प्रकृति संबंधित सापेक्षता की चर्चा की थी, इस बार हम देखेंगे मनुष्य की सामाजिक सापेक्षता के संदर्भ…

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मनुष्य और उसकी चेतना परिवेश और समाज के साथ उसके क्रियाकलाप का उत्पाद हैं। मनुष्य का विकास, समाज के साथ उसकी अंतर्क्रियाओं पर निर्भर करता है और मनुष्य समाज द्वारा पोषित अनुभवों से गुजरते हुए तद्‍अनुसार ही भाषा और व्यवहारिक ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य के रूप में उभरता है।
समाज से विलग मनुष्य का कोई अस्तित्व संभव नहीं हो सकता और किसी अपवाद स्वरूप अस्तित्व बचा रह भी जाए तो वह मनुष्य के जाने पहचाने रूप में विकसित नहीं हो सकता।
एक ओर सामाजिक व्यवहार के कारण विकसित मनुष्य की यह समझ, विवेक और उसके सामाजिक क्रियाकलापों, विचारों और व्यवहारों को नियंत्रित और नियमित करती रहती है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति की एक पैदाइश के रूप में मनुष्य की प्राकृतिक स्वभाव की नाभिनालबद्धता उसे एक व्यक्तिगत ईकाई के रूप में, व्यक्तिगत जिजीविषा हेतु विचार और व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती रहती है। जाहिर है कि मनुष्य अपनी इस सामाजिक और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अंतर्विरोध में हमेशा घिरा रहता है।

अब जरा व्यक्तिगत आवश्यकताओं की भी पड़ताल करते हैं कि क्या वाकई ये व्यक्तिगत आवश्यकताएं हैं?
अगर इन व्यक्तिगत आवश्यकताओं की तह में जाया जाए तो मूलभूत आवश्यकता के रूप में भोजन प्राप्ति, विपरीत परिस्थितियों से बचने की स्वाभाविक प्रवृति और यौन जरूरतें ही इसकी जद में आती हैं। यौन-तुष्टी की आवश्यकता के सकारात्मक रूप भी, चूंकि इसमें एक अन्य व्यक्ति और अस्तित्व में आता है, सामाजिक परिधी के दायरे में ही आते हैं। नकारात्मक यौन कुंठाओं की पूर्ति की दुर्दम्य इच्छा को ही इस व्यक्तिगत मामले में रखा जा सकता है, जबकि इसके लिए भी उस दूसरे के अस्तित्व को बलपूर्वक बेहयाई से नकारना आवश्यक है। इसलिए केवल भोजन के कुछ रूप और बचाव की प्रवृति को ही मनुष्य की नितांत व्यक्तिगत आवश्यकताओं की श्रेणी में रखा जा सकता है, इस बात को भूलते हुए कि मनुष्य इनके व्यवहार भी समाज के अंदर रह कर ही सीखता है। बाकि सभी (और वैसे तो ये सभी भी) व्यक्तिगत आवश्यकताएं किसी ना किसी रूप में सामाजिकता से अभिन्न रूप से जुडी़ होती हैं।

अतएव यह आसानी से समझा जा सकता है कि मनुष्य की जिंदगी में व्यक्तिगत कुछ नहीं होता। वह खुद, उसकी सारी तथाकथित व्यक्तिगत आवश्यकताएं, उसकी सारी भावनाएं, विचार, क्रियाकलाप किसी ना किसी रूप में दूसरों से, फलतः समाज से जुडे़ होते हैं। उसकी व्यक्तिगतता का अस्तित्व, यदि वह यह भ्रम रखना भी चाहता है तो दूसरों के यानि की समाज के बेहयाईपूर्ण नकार से, अस्वीकार से या बलपूर्वक चतुराई से ही थोडा़ बहुत संभव हो सकता है।
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आज इतना ही…
बाकि अगली बार…जिसमें प्रेम की जांच पड़ताल की जाएगी……

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. चंदन कुमार मिश्र
    जुलाई 24, 2011 @ 17:58:19

    अन्तर्विरोध !

    प्रतिक्रिया

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