अपने समय के साथ होना

हे मानव श्रेष्ठों,
पिछली बार हमनें बात की थी ज्ञान और समझ को निर्धारित करने वाले कारकों के बारे में।
चलिये क्रमिक विकास के दोहराव वाली बात का सिरा फिर से पकड़ते हैं…..

मनुष्य जिस तरह शारीरिक और मानसिक रूप से अपने इतिहास को दोहराता है, उसी तरह जिज्ञासाओं और समझ के स्तर के परिष्करण की प्रक्रियाओं में, मानव जाति के ज्ञान के क्रमिक विकास को दोहराता है। मनुष्य का हर बच्चा प्रकॄति की हर शै, हर चीज़ को वैसे ही देखता और चमत्कृत होता है जैसे कि आदिम मनुष्य होता था, हर चीज़ और उसके साथ अंतर्क्रिया उसके अंदर वैसे ही जिज्ञासा पैदा करती है जैसे कि मानव जाति को पहले करती रही है। वह अपने परिवेश की हर चीज़ के प्रति वैसे ही जिज्ञासापूर्ण प्रतिक्रिया करता है, जैसे उसके पूर्वज करते रहे थे। वह अपनी तात्कालिक समझ के हिसाब से हर चीज़ को अपने दिमाग़ में प्रतिबिंबित करता है, उसका विश्लेषण करता है। वह वैसे ही उंगलियों के सहारे गिनना सीखता है, ऊलजलूल आवाज़ों से शुरू होकर धीरे-धीरे भाषा सीखता है, लिखने का अभ्यास तो जैसे उसकी जान ही ले लेता है, वह वैसी ही आड़ी-टेड़ी आकृतियों से अपने कागज़ भरता है जैसे कि उसके आदिम पूर्वज चट्टानो पर उकेरा करते थे। वह प्रकृति की शक्तियों और नियमों को जानने और उनके सापेक्ष अपने अस्तित्व को समझने के शाश्वत कार्य में जुटा रहता है। अपने पूर्वजों की तरह ही, उसकी अविकसित समझ भी इस तथ्य को मानने में उतना ही विद्रोह करती है कि पृथ्वी सूर्य के चारों और परिक्रमण करती है, क्योंकि यहां उसकी सहज बुद्धि आडे आती है जिसका प्रेक्षण होता है कि वह तो स्थिर है और सूर्य आसमान में पूर्व से पश्चिम की यात्रा कर रहा है। आप कई ऐसे व्यक्तियों को जानते होंगे जो अपनी सारी उम्र गुजार देते हैं पर चंद्रमा की कलाओं का रहस्य उन्हें समझ नहीं आता।
अब तक की संपूर्ण विवेचना से अब हम दो सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं, पहला तो यह कि प्रत्येक मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर पर शून्य से शुरू होते हैं, और अपनी परिवेशी परिस्थितियों के अनुरूप धीरे-धीरे इसका विकास करते हैं, निरंतर इसका परिष्कार करते हैं। इसीलिए अलग-अलग मनुष्य, एक ही समय में ज्ञान और समझ के समय-सापेक्ष विभिन्न स्तरों पर होते हैं, कुछ इनके विकास की प्रक्रिया में रहते हैं और कहीं यह प्रक्रिया रुक भी जाती है। दूसरा यह कि इस ज्ञान और समझ के स्तर को और आगे विकसित करने की संभावनाएं निरंतर मौजूद रहती हैं गोया कि मानव जाति का सापेक्ष आधुनिक स्तर इस मुआमले में काफ़ी आगे निकल आया है, अतएव ज्ञान और समझ के अद्यतन स्तर पर होना अपने समय के साथ होना है।
अगर आपको मानव जाति के इतिहास का थोडा भी सामान्य ग्यान है तो आप यह आसानी से देख सकते हैं कि व्याक्ति-विशेष या आप स्वयं समय के किस स्तर पर हैं, समय के किस अंतराल के सापेक्ष अवस्थित हैं। यहां यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एक ही मनुष्य, अपने से संबंधित विभिन्न मुआमलों में, समय के विभिन्न स्तरों पर हो सकता है गोया कि अलग-अलग क्षेत्रों में उसका हस्तक्षेप अलग-अलग होता है।
यदि किसी मनुष्य को प्रकृति की सामान्य शक्तियां रहस्यमयी और चमत्कारी लगती हैं, तो यह समझा जा सकता है कि वह आदिम युग में यानि लाखों वर्ष पूर्व के समय में अवस्थित है। यदि ये शक्तियां उसके मस्तिष्क में अलौकिक देव-शक्तियों के रूप में प्रतिबिंबित होती हैं जिन्हें खुश करके नियंत्रित किया जा सकता है तो वह दसियों हजार साल पहले के समय में अवस्थित है। जो मनुष्य इस तरह से सोचता है कि इस अनोखी और विराट सृष्टि की नियामक एवं रचयिता एक अलौकिक दिव्य शक्ति है जिसकी इच्छानुसार दुनिया का कार्य-व्यापार चल रहा है, तो यह कहा जा सकता है कि वह समय के सापेक्ष चार-पांच हजार साल पहले उत्तर-वैदिक काल में अवस्थित है। यदि कोई मनुष्य इस अलौकिक शक्ति के विचार में संदेह करता है और दुखों से मुक्ति हेतु, यथास्थिति बनाए रखते हुए अपने आत्मिक आचरण की शुद्धि वाले विचार से आकर्षित होता है, तो उसे बुद्ध-ईसा के काल यानि दो-ढ़ाई हजार साल पहले के समय मे अवस्थित माना जा सकता है। यदि वह चीज़ों के पारंपरिक ज्ञान और प्रयोग से संतुष्ट नहीं है और उनमें नये नियम और संभावनाएं खोजने की प्रवृति रखता है और ’ऐसा ही क्यों है’ के नज़रिये से सोचने लगा है तो मान लीजिये वह सोलहवी शताब्दी तक आ पहुंचा है। यदि वह प्रकृति के सुव्यवस्थित ज्ञान मतलब विज्ञान को आत्त्मसात करके अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर चुका है तो वह अठारहवीं शताब्दी में पहुंच गया है, और इसी विकसित वैज्ञानिक दृष्टिकोण से वह जीव विकासवाद और प्राचीन समाज के क्रमिक विकास के अध्ययन और निष्कर्षों को आत्मसात करने की अवस्थाओं मे है तो वह १५० साल पहले तक पहुंच गया है। यदि वह दर्शन के क्षेत्र में द्वंदात्मक और एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांतों और निष्कर्षों को आत्मसात करके अपना एक द्वंदवादी विश्वदृष्टिकोण निर्मित कर चुका है तो यक़ीन मानिए वह १००-१२५ साल पूर्व से आधुनिक समय के अंतराल में पहुंच गया है और समझ और विवेक के मुआमले में लगभग समय के साथ चल रहा है।
लगता है अब तो यह बात साफ़ हो गयी होगी कि अधिकतर लोग मुझ तक क्यों नहीं पहुंच पाते। यह भी कि आज के समय में पैदा हो जाने मात्र से कोई मनुष्य समय के साथ नहीं आ जाता, मानव जाति के ऐतिहासिक ज्ञान, विज्ञान व तकनीकि द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का उपभोग करना सीख कर ही वह आधुनिक नहीं हो जाता। दरअसल वह सही अर्थों में तभी आधुनिक हो सकता है, तभी अपने समय के साथ हो सकता है जब वह अपने ज्ञान, समझ और विवेक के स्तर को विकसित करके उसे संपूर्ण मानव जाति के ज्ञान, समझ और विवेक के अद्यतन स्तर तक नहीं ले आता।

तो हे मानव श्रेष्ठों !
एक जरा सी बात पर समय की यह विस्तृत विवेचना पची या नहीं?
आत्मालोचना और सत्य के अन्वेषण की माथापच्ची, दिमाग़ को थोडा़ कष्ट तो देगी ही।
आप अपनी असहमति, जिज्ञासाओं और विषय-विशेष पर इच्छित खुलासे की इच्छा को यहां नीचे टिप्पणी करके या मुझे ई-मेल (mainsamayhoon@gmail.com) करके दर्ज़ करा सकते हैं।
कॄपया संवाद करें।
समय आपकी सेवा में हाज़िर है।

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5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    मई 02, 2009 @ 18:41:00

    पहले से पची पचाई है जी।

    प्रतिक्रिया

  2. नारदमुनि
    मई 03, 2009 @ 01:56:00

    narayan narayan

    प्रतिक्रिया

  3. संदीप
    मई 03, 2009 @ 06:21:00

    आपकी बात से सहमत हूं कि किसी मनुष्य को प्रकृति की सामान्य शक्तियां रहस्यमयी और चमत्कारी लगती हैं, तो वह आदिम युग में यानि लाखों वर्ष पूर्व के समय में अवस्थित है। यदि ये शक्तियां उसके मस्तिष्क में अलौकिक देव-शक्तियों के रूप में प्रतिबिंबित होती हैं जिन्हें खुश करके नियंत्रित किया जा सकता है तो वह दसियों हजार साल पहले के समय में अवस्थित है।

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  4. दीपक भारतदीप
    मई 04, 2009 @ 17:26:00

    मनुष्य समय के साथ नहीं आ जाता, मानव जाति के ऐतिहासिक ज्ञान, विज्ञान व तकनीकि द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का उपभोग करना सीख कर ही वह आधुनिक नहीं हो जाता। दरअसल वह सही अर्थों में तभी आधुनिक हो सकता है, तभी अपने समय के साथ हो सकता है जब वह अपने ज्ञान, समझ और विवेक के स्तर को विकसित करके उसे संपूर्ण मानव जाति के ज्ञान, समझ और विवेक के अद्यतन स्तर तक नहीं ले आता।——————-मेरे विचार से आदमी अगर स्वयं को ही दृष्टा की तरह देखे तो उसे वह गुण दोष अपने आप में ही दिखाई देंगे जो वह दूसरों में देखता है। पूरे दिन ही इस धरती पर आने वाले उतार चढ़ाव को ध्यान से देखकर अध्ययन कर ले तो उससे वह इतिहास को समझ लेगा।जीवन की मृत्यु तय है पर महत्व इस बात का है कि कौन कैसे जिया। आपका यह लेख बहुत अच्छा लगा।दीपक भारतदीप

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  5. चंदन कुमार मिश्र
    जुलाई 24, 2011 @ 16:03:08

    इस बार तो बहुत सुन्दर लगा। आश्चर्य है कि सब कुछ पहले से मालूम है लेकिन एक व्यवस्थित तरीके से ऐसा है तो अच्छा लगा। समय का जिक्र भी पसन्द आया कि कौन आदमी किस समय में है। "प्रत्येक मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर पर शून्य से शुरू होते हैं, और अपनी परिवेशी परिस्थितियों के अनुरूप धीरे-धीरे इसका विकास करते हैं, निरंतर इसका परिष्कार करते हैं। इसीलिए अलग-अलग मनुष्य, एक ही समय में ज्ञान और समझ के समय-सापेक्ष विभिन्न स्तरों पर होते हैं, कुछ इनके विकास की प्रक्रिया में रहते हैं और कहीं यह प्रक्रिया रुक भी जाती है।"यह तो सत्य है और मैं मानता हूँ कि सब कुछ शून्य से शुरु से होता है और पुनर्जन्म का सिद्धान्त नकली है। मेरे पिता रामानुजन को अलौकिक मानते हैं और मैं एकदम सामान्य और एक क्रमबद्ध जीवन जीने वाला और गणित का अध्येता और शोधकर्ता मानता हूँ।

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