समाज के भाववादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, हम यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद पर एक शृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश करते हुए, अगली बार से हम विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सामाजिक सत्ता और सामाजिक चेतना के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश करते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज की भौतिकवादी संकल्पना और इसका इतिहास

समाज के भाववादी/प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

( idealist and materialist conceptions of society )

जिस तरह कि हम भूतद्रव्य ( matter ) और चेतना ( consciousness ) के मामले में पहले देख चुके हैं, सामाजिकआस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) के बीच संबंध और प्राथमिकता वाले प्रश्न, यानी कि किस चीज़ को आद्य ( primitive ), प्राथमिक, निर्धारक, दुनिया का आधार माना जाये – सत्ता या चेतना को? का उत्तर सभी कालों के दार्शनिकों को दो मूल विरोधी शिविरों – भौतिकवादी और भाववादी – में विभाजित कर देता है। इन मूल धाराओं की कई थोड़ी अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आती जाती हैं जो कि कुछ सैद्धांतिक मत-भिन्नताएं रखती हैं फिर भी उनके सारतत्व ( essence ) के अनुसार वे अंततः किसी एक धारा के अंतर्गत पहचानी जा सकती है।

समाज के भौतिकवादी और भाववादी दृष्टिकोणों के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करने के लिए हम यहां उनकी कुछ मूल प्रस्थापनाओं को देख सकते हैं।

आत्मगत भाववादियों ( subjective idealists ) के अनुसार भौतिक वस्तुएं एक दूसरे से मिलती जुलती होती हैं किंतु लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी अद्वितीय व्यष्टिकता ( inimitable individuality ) है, जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करती है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों के क्रियाकलाप के कोई वस्तुगत ( objective ) नियम नहीं होते क्योंकि वे व्यक्तिगत अद्वितीय लक्ष्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। और जो भी अद्वितीय तथा सांयोगिक है, वह नियमों से संचालित नहीं हो सकता। इसलिए वे समाज में मुख्य चीज़, उसके लक्ष्य ( aims ), संकल्प ( will ) तथा अलग-अलग लोगों के इरादों को मानते हैं। यह धारा सबसे अधिक दिलचस्पी महान व्यक्तियों में दिखाती है क्योंकि वे समूहों को अपनी और आकृष्ट करते हैं, एक ऐसे चयनित पथ पर उनका नेतृत्व करते हैं जिसका कोई पूर्वज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वे रचनात्मक व्यक्ति होते हैं। इनका मानना है कि समाज के विकास के बारे में बातें करना निरर्थक है, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के विकास की ही बातें की जा सकती हैं।

वस्तुगत भाववादी ( objective idealists ) उपरोक्त से भिन्न यह सोचते हैं कि लोग सामान्य नियमों के अधीन हैं और उनसे संचालित होते हैं। परंतु ये सामान्य नियम, विचारों के, सामाजिक चेतना के विकास के नियम हैं जो हर युग में व्यक्तियों, व्यष्टिक कामनाओं ( desires ) और संकल्पों को संचालित करते हैं। मसलन, मध्ययुग में लोग बड़े पैमाने पर धर्मप्रवण थे क्योंकि ईश्वर का प्रत्यय ( idea ) प्रभावी था। इंगलैंड और फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति की पूर्वबेला में स्वतंत्रता का विचार प्रमुख था और बुर्जुआ वर्ग ने सामंतवादी राज्य-तंत्रों के ख़िलाफ़ संघर्ष में इसका उपयोग किया। इनके अनुसार इसी तरह हमारे युग में यदि सार्विक कल्याण तथा वर्ग भ्रातृत्व ( class brotherhood ) के विचार आम हो जाते हैं और अगर वे लोगों के मन में घर कर लेते हैं, तो वर्ग संघर्ष ( class struggle ) सहित सारा संघर्ष ख़त्म हो जायेगा और मौजूदा सामाजिक प्रणाली हमेशा के लिए अभिपुष्ट ( confirmed ) हो जायेगी। दूसरे शब्दों में, लोग हमेशा किन्हीं विचारों के अनुसार व्यवहार करते हैं। जरूरी सिर्फ़ यह है कि इन विचारों को सही ढंग से समझा जाये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) इन दोनों मतों के अधिभूतवादी उपागम ( metaphysical approach ) को सामने लाता है। ये मत अधिभूतवादी इसलिए हैं कि ये यथार्थता ( reality ) के एक पक्ष ( aspect ) को लेकर उसे दूसरे पक्षों के मुक़ाबले में रख देते हैं और इस तरह यथार्थ को समग्रता ( totality ) में नहीं देख पाते। आत्मगत और वस्तुगत भाववाद यह नहीं समझा सकते हैं कि समाज दासप्रथात्मक, सामंतवादी, पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं से ही होकर क्यों गुजरता है? यदि समाज में वस्तुगत नियम और प्रतिमान ( pattern ) नहीं हैं, तो इंगलैंड, फ्रांस, अमरीका, नीदरलैंड आदि देशों में संपन्न पूंजीवादी क्रांतियों के लक्षणों की समानताओं का क्या कारण है? यदि सब कुछ व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता पर निर्भर है, तो विश्व में समाज के विकास का प्रतिरूप लगभग एक जैसा क्यूं है और क्यों कुछ देशों ने समाजवाद की राह पकड़ी?

भाववाद इस तथ्य का कोई सार्थक स्पष्टीकरण नहीं दे पाता है कि कि एक युग में कुछ विचार प्रमुख होते हैं और दूसरे युग में दूसरे विचार और बहुधा विरोधी विचार प्रमुख हो जाते हैं। मसलन, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का विचार, प्राचीन काल में उत्पन्न क्यों नहीं हो सकता था? इसके अलावा, भाववादी विचार यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अवाम एक ऐतिहासिक युग में कुछ नेताओं का अनुसरण ( follow ) करते हैं और अन्य के दृष्टिकोणों ( views ) तथा आह्वानों ( calls ) को ठुकरा देते हैं। इतिहास में ऐसी अवधियां थीं, जब अवाम ने स्वयं अपनी ही पांत के लोगों की अगुआई में चलनेवाले सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

आत्मगत और वस्तुगत भाववाद इनमें से किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं देते हैं, जबकि ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो सामाजिक समस्याओं की अत्यधिक जटिलता ( complexity ) को मान्यता देता है, ऐसे सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है जो कि अपनी सक्रिय स्थिति को विकसित और विस्तारित ( elaborate ) कर सकते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय अविराम

एक नई शृंखला की शुरुआत

एक नई शृंखला की शुरुआत

हे मानवश्रेष्ठों,

हम यहां काफ़ी समय पहले दर्शन पर एक शृंखला प्रस्तुत कर चुके हैं। दर्शन की उस प्रारंभिक यात्रा में हमने दर्शन की संकल्पनाओं ( concepts ) तथा दर्शन और चेतना के संबंधों को समझने की कोशिश की थी। तत्पश्चात हमने यहां उसे ही आगे बढ़ाते हुए, द्वंद्ववाद ( dialectics ) पर, जिसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के अंतर्गत समझा जाता है, पर एक शृंखला यहां प्रस्तुत की थी। वह सामग्री यहां उपलब्ध है ही, साथ ही उस सामग्री के समेकित पीडीएफ़ डाउनलोड़ लिंक ‘दर्शन और चेतना’ तथा ‘द्वंद्ववाद-समग्र-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ भी साइड़बार में प्रदर्शित है। इच्छुक मानवश्रेष्ठ उससे पुनः गुजर सकते हैं।

अब हमारी योजना है कि दर्शन पर उस शृंखला को आगे बढ़ाया जाए और सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझने के प्रयासों के संदर्भ में इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना यानी ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के ज्ञान और सिद्धांत से परिचित होने की कोशिशें शुरू की जाएं।

दर्शन का बुनियादी सवाल यह होता है कि परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या मनुष्य उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है। इस तरह इस सवाल का पहला पक्ष परिवेश के साथ उसके संबंधों से है और आम तौर पर इसे इस तरह निरूपित किया जाता है कि आसपास की वास्तविकता ( reality ) या भूतद्रव्य ( matter ) के साथ चेतना और चिंतन का संबंध क्या है?  पूर्व में हम यहां पर भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर ‘दर्शन और चेतना’ शीर्षक से प्रस्तुत सामग्री के अंतर्गत चर्चा कर चुके हैं। किंतु मनुष्य समाज में रहता है और उसे सामाजिक विकास के नियमों में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी होती है। उन्हें समझने के लिए दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन के संदर्भ में जांचना आवश्यक है। इसका मतलब यह है कि हमें सामाजिक अस्तित्व या सत्ता और सामाजिक चेतना के बीच संबंध का और इस बात का स्पष्टीकरण देना होगा कि जनगण के क्रियाकलाप और समाज के इतिहास में, इनमें से प्राथमिक और निर्धारक ( primary and determining ) तत्व क्या है। इसका उत्तर हमें ऐतिहासिक भौतिकवाद यानी इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना से प्राप्त होता है।

हम इस नई श्रृंखला में ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा इससे संबंधित विभिन्न संकल्पनाओं/अवधारणाओं को समझने की कोशिश करेंगे। हम देखेंगे कि सामान्य जीवन में हम इन दार्शनिक अवधारणाओं से अपरिचित होते हुए भी, जीवन से मिली सीख के अनुसार ही भौतिकवादी चिंतन और पद्धतियों का प्रयोग करते हैं, निर्णय और तदनुकूल व्यवहार भी करते हैं। परंतु यह भी सही है कि कई बार, कई जगह हम अपने वैचारिक अनुकूलनों ( conceptual conditioning ) के प्रभाव या सटीक विश्लेषण-संश्लेषण ( analysis-synthesis ) के अभाव के कारण कई परिघटनाओं ( phenomena ) की समुचित व्याख्या नहीं कर पाते, सही समझ नहीं बना पाते और तदनुकूल ( accordingly ) ही हमारे निर्णय और व्यवहार भी प्रभावित होते हैं। इस श्रृंखला से गुजरकर हम निश्चित ही, अपनी चिंतन प्रक्रिया और व्यवहार को अधिक सटीक तथा अधिक बेहतर बनाने में अधिक सक्षम हो पाएंगे, अपने व्यक्तित्व और समझ का परिष्कार ( refinement ) कर पाएंगे।

अगली बार से इसकी औपचारिक प्रस्तुति शुरू की जाएगी।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत रहेगा ही।
शुक्रिया।

समय अविराम

प्रकृति और समाज-श्रॄंखला समाप्ति-पीडीएफ़ पुस्तिका

हे मानवश्रेष्ठों,

प्रकृति और समाज’ पर चल रही श्रृंखला अब समाप्त होती है। कुछ ही समय में फिर किसी नयी श्रॄंखला की यहां पर शुरुआत की जाएगी। कोई सार्थक सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।


1050प्रकृति और समाज – श्रॄंखला समाप्ति – पीडीएफ़ पुस्तिका

जैसा कि यहां की परंपरा है, ‘प्रकृति और समाज’ पर प्रस्तुत सामग्री को पीडीएफ़ पुस्तिका के रूप में उपलब्ध करा दिया गया है। नीचे प्रस्तुत लिंक से इसे डाउनलोड किया जा सकता है। इसे साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेगा ही।

प्रकृति और समाज – हिंदी – डाउनलोडेबल पीडीएफ़
nature and society – in hindi – free downloadable pdf – size 313kb – 28page


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष की चर्चा के साथ इस श्रृंखला का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष
( ecological consciousness and ideological struggle )

11-20प्रकृति के विकास तथा सामाजिक विकास के नियम वस्तुगत ( objective ) ढंग से संक्रिया करते हैं, किंतु उनका कार्यान्वयन सचेत ( conscious ) लोगों के क्रियाकलाप द्वारा होता है। प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया ( interaction ), प्रकृति के विकास तथा समाज के विकास दोनों के नियमों के अनुसार, यानी सामाजिक चेतना के एक विशेष रूप अर्थात पारिस्थितिक चेतना के रूप में होना जरूरी है। मनुष्य और समाज को प्रकृति के महत्व का बोध धीरे-धीरे, सदियों के दौरान होता है। किंतु पारिस्थितिक चेतना सापेक्षतः हाल ही में, चंद दशकों के दौरान बनी है।

इसका विशेष लक्षण यह है कि यह एक प्रकार की सामूहिक सामाजिक चेतना है, जो उस वास्तविक, जटिल, अंतर्विरोधी तथा अत्यंत ख़तरनाक स्थिति को परावर्तित ( reflect ) करती है जो आधुनिक जगत में पारिस्थितिक संतुलन की गड़बड़ी, पर्यावरणीय प्रदूषण, प्राकॄतिक संसाधनों के ख़त्म होने के ख़तरे तथा वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक नतीजों के रूप में मनुष्यजाति के सामाजिक पतन की सम्भावना के परिणामस्वरूप बनी है। शुरू में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डाक्टरों, लेखकों व कलाकारों के अलग-अलह समूहों, विभिन्न जातीय समूहों, आदि द्वारा इन परिणामों के खिलाफ़ प्रतिरोध की शक्ल में उत्पन्न पारिस्थितिक चेतना ने अब सारे देशों के सैकड़ों लाखों के दिल-दिमाग़ों में घर कर लिया है।

इसके विकास का एक सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निष्कर्ष है कि पारिस्थितिक संतुलन की पुनर्स्थापना और प्रकृति की सुरक्षा तथा ‘पुनर्वास’ ( rehabilitation ) सार्विक ( universal ) दिलचस्पी और सार्विक मूल्य के हैं। किंतु इससे यह तथ्य अपवर्जित ( exclude ) नहीं होता कि पारिस्थितिक चेतना के दायरे के अंतर्गत तीव्र वैचारिक संघर्ष चलाया जा रहा है और उसका चलना जारी रहेगा। विकसित पूंजीवादी देशों में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के उत्साही समर्थक पारिस्थितिक महाविपत्ति के ख़तरे को मान्यता देते हुए इसका दोष विकासमान देशों के जनगण पर उन मेहनतकशों पर मढ़ने की चेष्टा कर रहे हैं, जो, उनके कथनानुसार, प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।

इनके विपरीत ‘ग्रीन्स’ ( Greens ) के विचारक सारी पारिस्थितिक विपदाओं का दोष बड़े पैमाने के उद्योग, आधुनिक तकनीक और सारी वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को और साथ ही किसी भी क़ीमत पर ( यहां तक कि प्रकृति के विनाश की क़ीमत पर भी ) इसे आगे बढ़ाने में स्वार्थपूर्ण दिलचस्पी रखनेवाली इजारेदार पूंजी ( monopoly capital ) पर रखते हैं। इस आधार पर बनी तथा विकसित सामाजिक-दार्शनिक प्रवृत्ति को विज्ञान-विरोधवाद ( anti-scientism ) और तकनीक-विरोधवाद ( anti-technicism ) कहते हैं। इसके नेतागणों में आधुनिक समाज की सारी आपदाओं का स्रोत को विज्ञान और इंजीनियरी के विकास में देखने का रुझान ( trend ) है। इन कारकों ( factors ) की भूमिका की अतिरंजना ( exaggeration ) स्वतः ही उद्योग के अमानवीयकरण तथा प्रकृति के विनाश की ओर ले जाती है।

d415711b-d59f-4a28-9811-8e6a6131b1fa-2060x1273वे इस मुसीबत से निकलने का रास्ता वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के अस्वीकरण ( rejection ) में, पूर्व-औद्योगिक, पारंपरिक उत्पादन, वैकल्पिक तकनीकों ( जिनसे उनका तात्पर्य दस्तकारी, आदिम लकड़ी के हलों से खेती, आदि से है ) की ओर वापसी में देखते हैं। किंतु तथ्यतः ये रूमानी आह्वान उनके पीछे छुपे निश्चित वैचारिक उसूलों को परावर्तित करते हैं। मनुष्यजाति के सारे दुर्भाग्यों के स्रोत को विज्ञान व तकनीक में देखते हुए इस प्रवृत्ति के प्रतिपादक वस्तुतः इस मुख्य बात को जाने-अनजाने पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक परिणाम स्वयं विज्ञान तथा तकनीक पर निर्भर नहीं करते, बल्कि उन्हें इस्तेमाल करने, उनका अनुप्रयोग करने के तरीक़ों पर, उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होते हैं, जिसके अंतर्गत उन्हें काम में लाया जाता है

पारिस्थितिक चेतना में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक यह समझ है कि प्रकृति केवल आर्थिक संसाधनों की एक प्रणाली, मनुष्यजाति के जीवित रहने का केवल एक पूर्वाधार ही नहीं, बल्कि सौंदर्यबोधात्मक ( aesthetic ) तथा नैतिक शिक्षा का, समाज के मानवीकरण का एक सबल कारक भी है।

पर्यावरण की रक्षार्थ कारगर, युक्तिसंगत, सुआधारित ( well-grounded ) उपायों के विकास के लिए वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती – इससे संज्ञान की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायेगी। बल्कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को, निजी हितों के बजाय समाज के हितों को सर्वोपरि रखने वाली एक इस तरह की सामाजिक प्रणाली ( social system ) में ढालने की जरूरत है जिसमें वह पारिस्थितिक संतुलन के साथ आंगिक रूप से ( organically ) संयुक्त हो और पर्यावरण की अखंडता ( integrity ) था उसका साकल्य ( wholeness ) बरकरार रहे। विज्ञान के अनुप्रयोग तथा नयी तकनीकों के उपयोग के नकारात्मक परिणामों को, स्वयं विज्ञान तथा तकनीक से ही दूर किया जा सकता है। परंतु ऐसा करने के लिए, उनके कार्यान्वयन तथा उनकी कार्यात्मकता ( functioning ) के लिए यह ज़रूरी है कि समाज सबसे पहले महत्तर ( greater ) सामाजिक न्याय की उपलब्धि की ओर उन्मुख हो।

समसामयिक पारिस्थितिक चेतना के विश्लेषण से पता चलता है कि यह स्वयं वैचारिकी का एक विकल्प ( alternative ) या उसका प्रतिपक्षी ( opposite ) नहीं है, क्योंकि पारिस्थितिक चेतना के अंदर एक वैचारिक संघर्ष भी जारी है। केवल ऐसी ही पारिस्थितिक चेतना सामाजिक समस्याओं के रिश्ते की सुस्पष्ट समझ दे सकती है तथा सामाजिक न्याय ( social justice ) के पुनर्निर्माण की ओर ले जा सकती है ; अतंतः केवल यही मनुष्यजाति के एक सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य, प्रकृति और समाज की सांमजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया की उपलब्धि करा सकती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – ३
( scientific and technological progress and its consequences – 3 )

images (4)(५) जैविकी ( biology ) के, विशेषतः जैव तकनीकी, आनुवंशिकी तथा जीन इंजीनियरिंग के विकास से अब जीवित अंगियों की आनुवंशिकता ( heredity ) को नियंत्रित करना संभव हो गया है। निकट भविष्य में जीन इंजीनियरिंग के उपयोग से लोग फ़सलों और पशुओं की उत्पादकता में तीव्र वृद्धि करने में कामयाब हो जायेंगे। इस क्षेत्र की उपलब्धियों से कई बीमारियों का उन्मूलन या रोकथाम करने, स्वास्थ्य में आम सुधार करने तथा जीवन को दीर्घ बनाने की दशाओं का निर्माण हो रहा है।

परंतु पूंजीवादी व्यवस्था में यह लाखों-करोड़ो लोगों को दीर्घकालिक भूख तथा कुपोषण से नहीं बचाता, क्योंकि खाद्य उत्पदन का मुख्य लक्ष्य मनुष्य का कल्याण नहीं, मुनाफ़ा कमाना है। इसके अलावा साम्राज्यवादी, इन जीन इंजीनियरिंग तथा अन्य जैविक विज्ञानों की उपलब्धियों को जैविक, रोगाणु युद्ध की तैयारी के लिए बेज़ा इस्तेमाल कर रहे हैं, मनुष्यजाति के सामने नये ख़तरे पैदा कर रहे हैं। अतः जैविकी का और अधिक सफल विकास, बहुसंख्या के हित में समाज द्वारा उसके नियंत्रण और प्रबंध को आवश्यक बना रहा है।

(६) वैज्ञानिक कृषि तकनीक आधुनिक समाज में अतिमहत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। बात यह है कि लोगों ने अनेक सहस्त्राब्दियों के दौरान कृषि तथा पशुपालन के क्षेत्र में विराट अनुभव अर्जित कर लिया है, जिससे उन्हें आवश्यक खाद्य प्राप्त होता रहा। किंतु अब तथाकथित जनसंख्या विस्फोट के कारण कई देशों में विशेषतः उपनिवेशवाद से मुक्त मुल्कों में परंपरागत ढंग से उत्पादित खाद्य रिज़र्व काफ़ी नहीं है।

आधुनिक विज्ञान ने कृषि के गहनीकरण के कई कारगर तरीक़ों का विकास किया है। उनमें शामिल हैं कारगर उर्वरकों, नवीनतम कृषि यंत्रों व इलेक्ट्रोनिकी का उपयोग, जल निकासी व सिंचाई की जटिल व्यवस्था करना तथा उच्च उत्पादकता वाले मवेशियों और पोल्ट्री तथा नये क़िस्म की फ़सलों का विकास करना। किंतु भिन्न-भिन्न सामाजिक प्रणालियों में इनके परिणाम भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं। मसलन, यूरोप और अमरीका के कुछ देश केवल अपनी ही आबादी के लिए नहीं, बल्कि अन्य देशों के लिए भी पर्याप्त खाद्य का उत्पादन कर रहे हैं, परंतु वे खाद्य को अक्सर राजनीतिक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं; जो देश उनकी राजनीतिक नीति का अनुसरण करते हैं वे उन्हें ही अनुकूल और मनचाही शर्तों पर खाद्य की पूर्ति करते हैं।

इससे निम्नांकित निष्कर्ष निकलता है : आधुनिक वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के परिणामों का स्वभाव स्वयं यंत्रों व तकनीक पर या पृथक वैज्ञानिक नतीजों पर निर्भर नहीं होता। यह उनके अनुप्रयोग की परिस्थितियों तथा उसके उद्देश्य पर निर्भर होता है। इस विश्लेषण का दार्शनिक अर्थ यह है कि पर्यावरण के साथ मनुष्य का या प्रकृति के साथ समाज का संबंध, निश्चित सामाजिक दशाओं द्वारा व्यवहित और संनियमित ( governed ) होता है। यदि हम इस संबंध को प्रकृति में गड़बड़ी न करनेवाला और साथ ही मानवजाति के विकासार्थ अनुकूल दशाओं को सुनिश्चित बनानेवाला सांमजस्यपूर्ण और रचनात्मक संबंध बनाना चाहते हैं, यो सबसे पहले और सर्वोपरि समुचित सामाजिक दशाओं का निर्माण करना जरूरी है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा  की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – २
( scientific and technological progress and its consequences – 2 )

images (3)(२) मनुष्यजाति की एक सबसे महत्वपूर्ण भूमंडलीय समस्या है ऊर्जा के नये स्रोतों की रचना और उपयोग। अभी तक ऊर्जा तकनीक की प्रमुख उपलब्धि परमणु ऊर्जा को उपयोग में लाना रही है, परंतु इसमें कई ख़तरे और अंतर्विरोध निहित हैं। एक तरफ़, परमाणु ऊर्जा सस्ती बिजली हासिल करना और क़ुदरती ईंधन की बचत करना संभव बनाती है। दूसरी तरफ़, यह लगातार रेडियो सक्रिय प्रदूषण का ख़तरा पैदा कर रही है। किंतु इसमें कोई शक नहीं कि सबसे बड़ा ख़तरा नाभिकीय अस्त्रों के निर्माण में निहित है।

आधुनिक वैज्ञानिक खोजें यह उम्मीद बंधाती हैं कि निकट भविष्य में नियंत्रित तापनाभिकीय क्रिया उपलब्ध कर ली जायेगी, जिससे लगभग असीमित ऊर्जा संसाधनों की प्राप्ति होने की संभावना है। इससे अनेक खनिजों का संरक्षण करना तथा तेल, कोयला व प्राकृतिक गैस के उपयोग को केवल रासायनिक उद्योग तक ही सीमित रखना संभव हो जायेगा।

(३) आधुनिक रासायनिक उद्योग ऐसी नयी कृत्रिम सामग्री हासिल करना संभव बना रहा है, जो प्रकृति में नहीं पाये जाते। इनसे प्राकृतिक चमड़े, लकड़ी, रबर, ऊन तथा कुछ धातुओं, आदि को प्रतिस्थापित किया जा रहा है। रसायन के अनुप्रयोग ( application ) से अत्यंत कारगर उर्वरकों, दवाओं और कीटनाशी पदार्थों का उत्पादन हो रहा है। इन सबसे प्राकृतिक संपदा के बेहतर उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है, कृषि की उत्पादकता बढ़ रही है और लोगों के स्वास्थ्य में सुधार व उम्र में वृद्धि हो रही है। परंतु साथ ही रासायनिक अपशिष्ट ( waste ) वायुमंडल, जल, मिट्टी, सागर-तल को दूषित भी कर रहे हैं। सारे संसार में पर्यावरणीय प्रदूषण की रोकथाम पर विराट संसाधन लगाये जा रहे हैं।

(४) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति अपशिष्टरहित तकनीकी की रचना करना संभव बना रही है। आधुनिक उद्योग और कृषि विज्ञान की उपलब्धियों के उपयोग से तकनीकी प्रक्रिया को इस तरह से व्यवस्थित कर सकते हैं कि जिससे उत्पादन जन्य अपशिष्ट वायुमंडल को दूषित करने के बजाय द्वितीयक कच्चे माल के रूप में फिर से उत्पादन चक्र में प्रविष्ट हो जाएंगे। जैव तकनीकी, रसायन का उपयोग तथा अपशिष्टरहित तकनीकी अनेक प्रकृति संरक्षण विधियों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है और साथ ही साथ मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल में उल्लेखनीय सुधार करने में मदद कर रही है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर चर्चा  की थी, इस बार हम वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर बात शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – १
( scientific and technological progress and its consequences – 1 )

patrick-bremer-collage-art-00अब वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की सामान्य विशेषताओं व लक्षणॊं से परिचित होने के बाद हम पूछ सकते हैं कि क्या प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया ( interaction ), समसामयिक ( contemporary ) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर निर्भर करती है और अगर ऐसा है, तो किस हद तक, और इसके परिणाम तथा नतीज़ों को सामाजिक-आर्थिक प्रणाली ( socio-economic system ) किस तरह निश्चित करती है?

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की वज़ह से उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) का तूफ़ानी विकास मनुष्य की शक्ति में बढ़ती कर रहा है। किंतु इस शक्ति का किस तरह से उपयोग हो रहा है? किसके लिए हो रहा है? मनुष्य की लगातार बढ़ती हुई शक्ति से कौन लाभ उठा रहा है? इस विचार-विमर्श को अधिक सारवान बनाने के लिए हमें इस प्रगति की मुख्य दशा-दिशाओं पर दृष्टिपात करना चाहिए।

(१) हम इसकी चर्चा कर चुके हैं कि किस तरह एक विशेष तकनीक, सूचना तकनीक, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की समसामयिक अवस्था पर उत्पादन तथा प्रबंध के कार्यकलाप के उत्प्रेरक की निर्धारक भूमिका अदा करती है। अब मानवजाति ऐसे सुपर कंप्यूटर बनाने की क्षमता से संपन्न है जो दसियों अरब संक्रियाएं प्रति सेकंड कर सकते हैं और उनकी स्मृति दसियों लाखों पुस्तकों में विद्यमान सूचना के बराबर जानकारी का भंडारण करने में समर्थ है और उनका आकार भी निरंतर कमतर होता जा रहा है।

आज कृत्रिम मस्तिष्क की रचना करने का काम जारी है। कृत्रिम मस्तिष्क युक्त कंप्यूटर अत्यंत जटिल तार्किक युक्तियां ( logical arguments ) संपन्न करने में समर्थ होंगे और उनकी मदद से वैज्ञानिक अनुसंधान, मशीनों की डिज़ाइनिंग तथा उद्यमों तक की डिज़ाइनिंग करना संभव हो सकेगा। वे लचीली ( flexible ) तकनीकों का नियंत्रण करने में समर्थ होंगे। और शायद व्यक्तिगत कंप्यूटरों की मदद से आधुनिक घरेलू उत्पादन इकाइयां बनाना, श्रम की उत्पादकता में तीव्र बढ़ती करना और शिक्षण के स्वरूप को बदलना संभव हो सकेगा। बच्चों और वयस्कों को नयी सूचना को दसियों गुना अधिक तेज़ी से आत्मसात करने का अवसर मिल सकता है, केवल विशेषज्ञों को उपलब्ध ज्ञान करोड़ों लोगों के लिए सुलभ किया जा सकता है। लोगों की जीवन पद्धति और पारस्परिक संसर्ग बदल जायेंगे और भाषा की बाधाएं भंग हो जायेंगी। कोशिश की जा रही हैं कि कंप्यूटर वैज्ञानिक साहित्य और दस्तावेज़ों को एक भाषा से दूसरी में क़रीब-क़रीब मनुष्य की सहायता के बिना ही अनूदित कर लेंगे। मनुष्य की भाषा को समझने में तथा रंगों व त्रि-आयामी दृश्य को देखने में समर्थ नयी पीढ़ी के रोबोटों का विकास जारी है। इस सबके क्या परिणाम होंगे?

पूंजीवादी समाज में, यहां तक कि विकसित देशों में भी ऐसे लोगों की विशाल संख्या है जो वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के कारण उत्पादन क्रियाकलाप के बाहर कर दिये गये हैं। कुछः नये रोज़गार उत्पन्न होने के बावजूद रोबोटीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के कारण बननेवाली बेरोज़गारों की फ़ौज लगातार बढ़ती जा रही है। इसकी वज़ह यह है कि पूंजीवादी उद्यम, सूचना तकनीक को मुख्यतः मुनाफ़े कमाने का तरीक़ा समझते हैं। फलतः इस तकनीक के फैलाव के नकारात्मक परिणाम स्वयं कंप्यूटरों तथा रोबोटों के अनुप्रयोग ( application ) नहीं, बल्कि उनके पूंजीवादी उपयोग के दुष्परिणाम हैं। अतएव ज़रूरत इस बात की है कि इस वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के लक्ष्य को सर्वथा भिन्न बनाया जाये। इसका उपयोग मुनाफ़ा कमाने के अधीन नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के हित में नियोजित ( planned ) किया जाये। समाजवादी ढांचे के अंतर्गत नयी तकनीकों के विकास की योजनाएं इस तरह से बनायी जायें कि सारी श्रम समर्थ आबादी सामाजिक दृष्टि से उपयोगी काम करती रहे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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